Tuesday, July 12, 2016

" जय भीम -लाल सलाम " सलामी समावेसी नहीं




" जय भीम -लाल सलाम " की सलामी समावेसी सल्यूट नहीं है. इसके अन्तर्निहित द्वंद्व और विरोधाभास भी हैं , कार्यनीतिक और रणनीतिक रूप से भी .यह सलामी , हरे रंग को दरकिनार करता है जो मुस्लिम ही नहीं किसानी रंग भी है. इसे सही है यह

हिन्दुस्तान में " नए वाम " का विकास , वर्गीय चेतना और प्रतिरोध बढ़ा कर ही हो सकता है कुंद कर नहीं. लाल रंग क्रांतिकारी चेतना का वैश्विक प्रतीक है. तय है कि लाल रंग ही  नए वाम की धूरी होगी। लेकिन यह भी स्पष्ट रहे कि प्रतिरोध का पहिया सिर्फ धूरी के बल फिलवक्त नहीं बढ़ाया जा सकता है. लाल रंग के सर्वकालिक वर्चस्व की अनिवार्यता की जिद ना रहे तो बेहतर।

मौजूदा दौर में प्रतिरोध की बिखरी ताकतों के बीच न्यूनतम सहमति के कार्यक्रमों को लेकर बढ़ने की जरुरत है. लेकिन उसके लिए लामबंदी के वास्ती समावेसी सलामी अपनाने की भी जरूरत है. कोई जरुरी नहीं कि व्यापक लामबंदी में शामिल हो सकने वाली ताकतें अपनी पहचान और अपने रंग का परित्याग कर ही साथ आएं। उत्पीडित समूहों की अलग पहचान बनाये रखना , नए वाम को विविधता -युक्त -एकता प्रदान करेगा।

जेएनयू वालों के बीच मेरा प्रस्ताव इंद्रधनुषी सलाम नही बल्कि " रेनबो सल्यूट " है जिसे मुम्बई की एक सभा में कामरेड शेहला ने अपना कर " सतरंगी सलाम " कहा जो विग्यान और सहज भाषाई द्रष्टि से भी " सबरंगी सलाम " के सुझाव से ज्यादा बेहतर है . रेनबो में सभी प्राथमिक रंग शामिल हैं. लाल , नीला , हरा आदि प्राथमिक रंग है। भगवा , प्राथमिक रंग नहीं है.

इंद्रधनुष शब्द , ' रेनबो ' का विग्यान-सम्मत वैकल्पिक शब्द नही है. यह मूल रूप से अंधविश्वास और ब्राह्मणवादी सोच पोषित करता है. पौराणिक आख्यान में इंद्र , देवताओं के राजा कहे गए है. उन्ही पौराणिक आख्यान के अनुसार इंद्र ने अहिल्या से बलात्कार किया था.

हमें नए वाम की सोच बढ़ाने के लिए नए प्रयोग करने ही होंगे। इन प्रयोगों से नए रास्ते खुलेंगे , कारवां बढ़ाने की ज़मीन तैयार होगी।
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