Sunday, August 30, 2015

एक थे 'भैया' , एक था ' मेमो '

हाशिया के पत्र :

एक थे 'भैया' , एक था ' मेमो '

दिनांक 20 जनवरी , 1995

शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख श्री राजेन्द्र सिंह के संवाददाता सम्मलेन का समाचार आपने दिया था जिसमें संघ द्वारा श्री नारायण दत्त तिवारी को समर्थन देने की बात कही गयी थी.श्री राजेन्द्र सिंह ने उक्त समाचार का खंडन किया है तथा इस तरह का दुर्भावना प्रेरित तथा असत्य समाचार देने पर क्षोभ व्यक्त किया है. श्री तिवारी ने भी उक्त समाचार दिए जाने पर आपत्ति की है तथा इसे गंदी राजनीति से प्रेरित बताया है।  इस पत्र के मिलने के तीन दिन के अंदर स्पष्ट करें कि आपने इस तरह का भ्रामक समाचार क्यों दिया ? जिससे हमारी संस्था की प्रतिस्ठा को गम्भीर आघात पहुंचा है.
(हस्ताक्षर ) 
हरि वल्लभ पाण्डेय
संपादक , यूनीवार्ता
                                    
मान्यवर, 
आपका पत्र ( पत्रांक 589/ 95 ) मिला। इस पर तारीख 20 जनवरी , 1995 टाईप है जबकि आपके हस्ताक्षर के नीचे एक माह बाद का दिनांक है.आशा है कि आप आगे की कारर्वाई के पहले यह भूल सुधार लेंगे। क्योंकि पत्र में संदर्भित प्रकरण जनवरी ,1995 का नहीं गत 17 फरवरी का है.वैसे मुझे ये पत्र 28 फरवरी, 1995 को मिला। तीन दिन के भीतर जवाब देने की बाध्यता के कारण जल्दबाज़ी में हो सकता है कि कुछ बातें स्पष्ट करनी शेष रह जाएँ। इसलिए मैं एक पूरक ऊत्तर भेजने का अपना अधिकार सुरक्षित रखता हूँ। इस पत्राचार के अंग्रेजी अनुवाद की आवश्यकता पड़ने पर गुरुजन के रूप में आपसे सहयोग मिलने का विश्वास रखता हूँ। 

अगर आपने अपने संवाददाता के बजाय केवल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख श्री राजेन्द सिंह द्वारा किये गए खंडन और कॉंग्रेस नेता श्री नारायण दत्त तिवारी की शिकायत मात्र पर विश्वास कर पहले ही ये निष्कर्ष निकाल लिया कि मैंने " भ्रामक समाचार " दिया है तो फिर मैं क्या स्पष्ट करूँ ? आपने मुझे ये स्पष्ट करने को कहा है कि मैंने " इस तरह का भ्रामक समाचार क्यों दिया ". मैंने कोई भ्रामक समाचार नहीं दिया इसलिए आपकी इस " क्यों " की जिज्ञासा पूरी नहीं की जा सकती है.

अब आप अगर ये महसूस करें कि किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व आपको " सहज न्याय " अथवा औपचारिकता ही सही मुझे अपना पक्ष रखने और " स्थति " स्पष्ट करने का मौक़ा देना चाहिए था तो फिर आग्रह है कि मेरी निम्नलिखित बातों पर विचार किया जाए
श्री राजेन्द्र सिंह का खंडन सच नही है।  उनके अपने कथन से मुकर जाने के जो भी कारण हों मेरी ऐसी कोई मजबूरी नहीं है कि समाचार के सच को झूठ और खंडन के झूठ को सच मान लूं।  श्री सिंह ने जिस खबर का खंडन किया है वह अपने अपने माध्यम से मेरे अलावा अनेक समाचार पत्रों और बीबीसी रेडिओ के संवाददाताओं ने भी दी। हो सकता है कि ऊत्तर प्रदेश के उन समाचार पत्रों पर आपकी नज़र नहीं पड़ी हो जिनमे उनके अपने संवाददाताओं ने भी कमोबेश यही खबर लिखी। इनमें से स्वतंत्र भारत (लखनऊ ), राष्ट्रीय सहारा (लखनऊ )और नवजीवन (लखनऊ) के अलावा टाइम्स ऑफ़ इंडिआ (लखनऊ ) के १८ फरवरी के संस्करणों की कटिंग्स संलग्न है।  वैसे लखनऊ में उपलब्ध मेरी सीमित जानकारी के अनुसार नयी दिल्ली के भी कई अखबारों में यह खबर प्रमुखता से छपी जिनमें स्टेट्समैन , टाइम्स ऑफ़ इंडिआ तथा बिज़नेस एंड पोलिटिकल ऑब्जर्वर जैसे प्रतिस्थिठ अखबारों पर आपकी नज़र जरूर पड़ी होगी जिनके कटिंग्स संलग्न हैं।

फिर भी कोई व्यक्ति अगर यही माने कि इन सारे अखबारों के संवाददाता एक साथ झूठे है तो निश्चय ही उस व्यक्ति की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के प्रति अंध निष्ठा होगी  बांकी लोग इस बात को भी ध्यान में रखेंगे कि नेताओं के अपने वक्तव्यों से मुकर जाना कोई असामान्य बात नहीं है अयोध्या प्रकरण की खबरें देने वाले संवाददाताओं का , जिनमे मैं भी शामिल हूँ , एक आम अनुभव है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं को सच को झूठ और झूठ को सच बनाकर दुनिया के सामने पेश कर भ्रम फैलाने में महारत हासिल है।  भारतीय प्रेस परिषद् इसकी पुष्टि कर चुका है।
श्री राजेन्द्र सिंह के खंडन पर विश्वास नहीं करने के और भी कई ठोस आधार हैं. टाईम्स ऑफ़ इंडिया और स्टेसमेन समेत कई अखबारों ने यह खंडन प्रकाशित करने लायक भी नहीं समझा।  बल्कि इन अखबारों ने बाद के दिनों में और भी अधिक समाचार दिए तथा सम्पादकीय भी लिखे।  इस सन्दर्भ में टाईम्स ऑफ़ इंडिया ( नई दिल्ली ) के 24 फरवरी के अंक में श्री अनिल सक्सेना द्वारा लिखित ' प्रथम लीड ' समाचार तथा उसी अखबार में अगले दिन छपा सम्पादकीय , पॉयनिअर के 21 फरवरी के अंक में श्री कुलदीप कुमार का लेख , स्टेसमैन में श्री सी आर ईरानी का 20 फरवरी को प्रकाशित ' कैविएट ' तथा हाल के दिनों में इकोनॉमिक टाइम्स और टेलीग्राफ में छपे सम्पादकीय उल्लेखनीय हैं. गौरतलब यह भी है कि जनसत्ता ने 20 फरवरी को अपने लखनऊ संवाददाता के हवाले से श्री राजेन्द्र सिंह का खंडन तो छापा लेकिन उसी दिन छपा उसका एक सम्पादकीय ,  ' अब तिवारी क्या करेंगे ' , खंडन से अप्रभावित रहा।  20 फरवरी को ही नवभारत टाईम्स ने इस खबर पर एक सम्पादकीय , ' प्रशंसा से दुखी ' , छापा मगर वह खंडन नहीं छापा जो 19 फरवरी को वाराणसी से हमारी संस्था के माध्यम से जारी किया जा चुका था।  जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस ने लखनऊ स्थित अपने जिन संवाददाताओं के हवाले से खंडन छापे और एक ' समाचार एजेंसी ' पर ' सरकार की साज़िश ' के तहत वह खबर छापने का आरोप लगाया उन दोनों संवाददाताओं ने हमारी संस्था के कार्यवाहक ब्यूरो प्रमुख ( लखनऊ ) के सम्मुख स्वीकार किया है कि वे श्री राजेन्द्र सिंह की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थित नहीं थे।  उनका यह भी कहना था कि मेरे मोटिव पर संदेह नहीं किया जा सकता है

मेरी जानकारी के अनुसार हमारी संस्था को छोड़ किसी ने भी इस खबर के लिए अपने संवाददाता को ' कारण बताओ नोटिस " नहीं जारी किया है. इस प्रकरण में श्री राजेन्द्र सिंह के विभिन्न स्थानो और माध्यमों से जारी खंडन पर ही गौर करें तो पता चल जाएगा कि वह खुद सभी को भ्रमित कर रहे हैं।  वाराणसी से हमारी संस्था के जरिये गत 19 फरवरी को जारी खंडन के मुताबिक़ लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस " में " उनसे यह  पूछा गया था कि आगामी लोक सभा चुनाव में यदि कोंग्रेस को पूर्ण बहुमत नही मिलता है तो संघ , प्रधानमंत्री राव और श्री अर्जुन सिंह में से किसे वरीयता देकर कोंग्रेस को समर्थन देगा।  श्री सिंह के अनुसार इस प्रकरण में श्री नारायण दत्त तिवारी का उल्लेख ही नहीं हुआ था. लेकिन बम्बई से गत 27 फरवरी को जारी श्री सिंह के खंडन पर गौर फरमाएं जो हिंदुस्तान टाईम्स में छपा है. इसमें श्री सिंह कहते हैं कि उनसे लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस के ' बाद ' पूछा गया था कि कोंग्रेस के टूट जाने पर आर एस एस किसका समर्थन करेगा - श्री राव , श्री अर्जुन सिंह या श्री तिवारी का।

वास्तविकता यह है कि श्री सिंह से सवाल प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही पूछा गया था।  यह सवाल पूछने वाला भी खुद मैं था।  सवाल था , " राष्ट्रीय़ स्वयं संघ के नेता ( अब दिवंगत ) भाऊराव देवरस ने कोंग्रेस के साथ सहयोग का जो प्रस्ताव रखा था उस पर संघ के मौजूदा नेतृत्व का रूक अगले लोक सभा चुनाव में कोंग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाने की सम्भावना के मद्देनज़र और देश में कोलिएशन पॉलिटिक्स के शुरू होते जा रहे दौर को ध्यान में रख कर क्या है ? प्रश्न में श्री राव , श्री अर्जुन सिंह और श्री तिवारी का कोई जिक्र नहीं था।  यह जिक्र जवाब में था। 

जवाबों के बीच कुछ अन्य विषयों पर भी चर्चा हुई।  मैंने खबर 'इंफेरेंस ' के आधार पर नहीं बल्कि उसी जवाब के ' कोट्स ' को उद्धृत कर दी।  दूसरे संवाददाताओं ने भी वही किया।  श्री सिंह ने कदापि नहीं कहा था कि वह ' ऑफ़ द रिकॉर्ड ' बोल रहे हैं. इस वक़्त तक चाय आदि के दौर जरुर शुरू हो गए थे।  कुछेक संवाददाताओं को लखनऊ में ही लगभग उसी वक़्त आयोजित श्री नारायण दत्त तिवारी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी भाग लेना था इसलिए वे श्री राजेन्द्र सिंह की बीच प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही वहाँ से उठ कर चले गए थे।  लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत तक श्री राजेन्द्र सिंह के समक्ष मेरे समेत कम से कम 10 संवाददाता उपस्थित थे. श्री नारायण दत्त तिवारी की शिकायत सम्भवतः उन संवाददाताओं से प्राप्त विवरण पर आधारित है जो श्री राजेन्द्र सिंह की प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत तक मौजूद नहीं थे.

अब एक अहम सवाल यह  रह जाता है कि राजेन्द्र सिंह की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बारे में हमारी संस्था की हिंदी की खबर और अंग्रेजी की खबर में अंतर क्यों है ? इसका कारण ब्यूरो प्रभारी से पूछा जाना चाहिए। हमारी अंग्रेजी सेवा के संवाददाता , श्री राजेन्द्र सिंह की प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह नहीं पहुँच सके थे। मजबूरी में उन्हें मेरी खबर का अनुवाद करना पड़ा।  लेकिन उन्हें ब्यूरो प्रभारी ने निर्देश दे दिया था कि वह अंग्रेजी खबर में श्री तिवारी के बारे में श्री राजेन्द्र सिंह के कथन का समावेश नहीं करें। ब्यूरो प्रभारी ने मुझे भी यही करने का " आग्रह " किया था।

 मैंने उनसे यही कहा था कि इतना  महत्त्वपूर्ण समाचार नहीं लिखना उचित नहीं होगा क्योकि शेष सभी यह खबर जरूर देंगे। फिर भी मैंने उनसे कहा कि मैं सभी ' टेक ' पहले लिख लेता हूँ और वह जैसा चाहें उसका उपयोग करें तथा ' इंट्रो ' बदलना उचित लगे तो वह भी कर लें , क्योंकि मुझे कोई और इंट्रो नज़र नही आ रहा था।  मैंने खुद पहला टेक ' सामान्य रीलीज ' होने से रोक दिया ताकि सभी टेक पहले ब्यूरो प्रभारी के सम्मुख आ जाएँ।  इतने में हमारी हिंदी सेवा के वरिस्ठ
सहयोगी भी कार्यालय आ गए थे।  सम्भवतः दोनों के निर्देश पर तब डेस्क पर बैठे हमारे एक सहयोगी ने सभी टेक विशेष फाईल में आपके ध्यानार्थ दिल्ली प्रेषित कर  दिए।  वे सभी टेक दिल्ली में आपकी स्वीकृति के बाद ही रिलीज हुए होंगे।

मेरा कार्य समाचार देना था और मेरी सिर्फ यह जिम्मेवारी  थी कि खबर भ्रामक ना हो , तथ्यों पर आधारित हो और वह जल्द से जल्द डेस्क पर पहुँच जाए. अगर मेरी खबर की विश्वसनीयता में कोई संदेह था या उससे किसी ऐसे विवाद के उठने की आशंका थी  जिसमें हमारी संस्था को नहीं पड़ना चाहिए और अंग्रेजी में यह खबर नहीं जाने से साफ है कि ब्यूरो प्रभारी को यह संदेह और आशंका थी तो संदेह दूर करने के लिए तभी मुझसे और विवरण मांगे जा सकते थे. संदेह या आशंका दूर नहीं हो पाने की स्थिति में मेरी खबर को स्पाईक भी किया जा सकता था. मेरे ब्यूरो प्रभारी या सम्पादक ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। अब जब मेरी खबर की विश्वसनीयता के प्रति सभी तरह के संदेह दूर हो जाने चाहिए थे मुझसे यह स्पष्टीकरण माँगा जा रहा है कि मैंने " भ्रामक समाचार क्यों दिया ". अपनी ही संस्था के सहयोगियों के मेरे प्रति उत्पन्न संदेह से मैं अभी काफी तनाव में हूँ , सम्भव है वह तनाव इस पात्र में भी परिलक्षित हुआ हो।  अगर उससे किसी सहयोगी की भावना आहत हुई हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।  जहाँ तक संस्था की प्रतिष्ठा कू आघात लगने की बात है अगर वास्तव में ऐसा कुछ मेरे कारण हुआ है तो मैं संस्था से त्यागपत्र देने के लिए भी तैयार हूँ।
भवदीय
हस्ताक्षर 
चन्द्र प्रकाश झा
वरिस्ठ संवाददाता
लखनऊ  , 02 -03 -1995
संलग्न : 16 पेज ( पेपर कटिंग्स आदि के )
प्रति : महाप्रबंधक ( अंग्रेजी अनुवाद बाद में )

प्रतिकविता : 003 


कवि , कविता और लोग.......

 

सपने में
एक औरत से बातचीत करने वाले कवि ने
टोका
तुम कौन
यहाँ क्यूँ 

फिर कहा
यह काव्य गोष्ठी है
तुम्हारा कविता से
क्या लेना -देना

मैं चुप रहा
और फिर सुना नहीं
और सुनता तो 
क्या सुनता
फिर क्या करता
और क्या कहता
यही ना
कि तुम्हारे सपने में
आने वाली हर औरत
और उसका मर्द
और उनके
बच्चे भी
हम ही तो हैं
( कविवर विमल कुमार से बिन  क्षमा याचना के )

फोटो : प्रदीप सौरभ

 प्रतिकविता :002 

हथेली नहीं देखती 

 


हथेली नहीं देखती
हम देखते हैं हथेली
उसकी लकीरें
उसकी उंगलियाँ
उँगलियों में अंगूठियां

हथेली नहीं देखती
हम देखते हैं
उस पर लगी मेंहदी
मिट्टी
पसीना
धब्बे
रक्त

हथेली नहीं देखती
हम देखते हैं
उसकी सुंदरता


हथेली नहीं देखती
हम देखते हैं
और व्याख्या करते -करवाते हैं
अपनी ही हथेली की 
लकीरों की
उंगलियाँ की
उंगलियाँ पर जडी अंगूठियों की
और
हम ही समझते 
और समझाते भी हैं सबको
उसकी सुंदरता


हथेली नहीं देखती
हमारी परेशानी
हम ही देखते है
अपनी परेशानी
अपनी हथेली देख 
देख देख कर
हथेली पर लगी
मिट्टी
पसीना
रक्त

हम नही जानते
दरअसल जानना ही नहीं चाहते
कि हथेली
क्या जानती है
क्या समझती है
क्या महसूस करती है
अपनी लकीरों से
अपनी उंगलियों से
अपनी उंगलियों पर जड़ी अंगूठियों से
अपने ऊपर लगी
मेंहदी से
मिट्टी से
पसीना से
रक्त से
हम समझना ही नही चाहते
अपनी ही हथेली की
वस्तुनिष्ठता

हम इतरा जाते हैं
अपनी हथेली पर
हथेली की
उंगलियों पर
उँगलियों पर
चांदी , सोना , हीरा
या फिर
कीमती पत्थरों से बनी -जड़ी
अंगूठियों पर
अपनी ही हथेली के
अपने ही किये श्रृंगार पर
हमारी हथेली आह भी नही करती
उसके श्रृंगार के अतिरिक्त भार से
हम आह्लादित होते हैं
अपनी ही हथेली के
अज्ञान से

बाअदब : 009

 

आदमी और शैतान 

 

आदमी है कि अक्सर कम जानता 
शैतान है कि हमेशा खूब जानता

आदमी है कि जुमलों पर जीता -मरता 
शैतान है कि आखिरी जुमला नही जानता

बाअदब:  008

 खुदा - नाखुदा 

 

खुदा है नहीं है बन्दे और काफिर जाने
नहीं है फिर है क्यों  खुदा क्या बन्दे जाने

खुदा नही पर है ये माज़रा हम क्या जाने
ना बन्दे जाने नाखुदा ना काफिर खुदा जाने
खुदा का रहमो-करम उसके बन्दे ही जाने
खुदा का कहर भी है कोई काफिर क्यों जाने 

खुदा के बन्दों माफ कर काफिरों हमें माफ कर
ना हमें खुदा के बन्दे जाने ना हम काफिर जाने

बरस दर बरस बीते कायम रहे उम्मीद क्या कम है
खुदा नही खुदाई भी नहीं खुद से उम्मीद क्या कम है

तन्हाई

बाअदब : 

तन्हाई

   

  तन्हाई भी अजीब शै है 
  ना सोती है ना सोने देती है
  जब लेती है घेर भीड़ में
  और दौड़ आती है अकेले में

हाशिया का अनुवाद :


घाेंघा ( गुंटर ग्रास )




सात वर्षों से
घाेंघा की बाट जाेह रहा हूँ मैं
और अब तक भूल चुका हूँ
उस जल जीव काे
कैसा हाेता है घाेंघा
देखने में
जब वह सामने आया
नग्न संवेदनशील
मैंने यही नाम ढूँढने की काेशिश की
मैंने कहा अनुभव, धैर्य, भाग्य
घाेंघा बगल से निकल गया
बिल्कुल चुपचाप

अनुवाद : चंद्रप्रकाश और इम्तियाज़ बख्शी " मोंटी " ,  जेएनयू 1986

*  जेएनयू में ही पढ़ने बाद अमेरिका जा बसीं तस्नीम रोज़नर ने मोंटी की असामयिक मौत के बाद श्रीनगर पहुँच अपने छोटे भाई से जुड़ी -बची तमाम चीजों को टटोलने की प्यारी जिद के साथ जेएनयू वालों से भी संपर्क किया।  गुजिश्ता ज़माने की मोंटी से जुड़ी बस यही चीज मेरे पास है।  शुक्रगुजार हैं हम साथी विमल कुमार  के जिन्होंने मूल जर्मन से किये इस अनुवाद को निखारा और श्रद्धेय  डीआर चौधरी का जिन्होंने रोहतक (हरियाणा ) से प्रकााशित अपने अखबार ' पींग ' में इसे और एक और कविता को भी जगह दी.

कमबख्त वक़्त : 005

कमबख्त चश्मा -1 

 

 

मुम्बई-दिल्ली-बागडोगरा-नक्सलबाड़ी- काकरभित्ता -बिराटनगर (नेपाल), 04-04 -2015.
कमबख्त वक़्त से मुम्बई में आज ब्रह्ममुहूर्त में एकतरफा विदाई की अफ़रातफ़री में चश्मा छूट गया. इसका भान एयरपोर्ट परिसर में प्रवेश करते ही पुराने परिचित टैक्सी ड्राईवर के यह पूछने के बाद हुआ कि  किस टर्मिनल से किस विमान सेवा की उड़ान से जाना है. टिकट प्रिंट बीती रात ही पैंट की जेब में बटुए के साथ रख दिए थे। ड्राईवर के सवाल पर टिकट पैंट की जेब से बाहर निकाल हाथ में लेते ही चश्मा की तलब लगी. उस बेहद जरूरी तलब लगते ही यह खुशफहमी दूर हो गई कि मुम्बई से कूच कर जाने पर कमबख्त वक़्त मेरा पीछा छोड देगा. समझ गया कि कमबख्त वक़्त ने मुझे उसके चंगुल से निकलने की जुर्रत करने की पहली सज़ा सुना दी है. खुद से खुद कह पड़ा ' इब्तिदा-ए-खुशवक्त  है रोता है क्या ,आगे-आगे देखिये होता है ".

घर लौटने का  बुरा-भला  कोई वक़्त ही नहीं था.  मैंने ड्राईवर को टिकट देकर कहा , " देखो क्या लिखा है '. उसने टिकट लेते ही कहा , " साहिब , हमको अंग्रेजी कहाँ आती है " मैंने उसे टैक्सी बगल में रोक अपना चश्मा देने कहा और उसके चश्मे से टिकट का फाईन प्रिंट पढ़ टर्मिनल नंबर आदि बता दिए. मैंने निर्धारित टर्मिनल पहुँच अपने सूटकेस और लैपटॉप बैग के साथ टैक्सी से उतर कर ड्राइवर को  तयशुदा भाड़ा चुकाने के साथ ही उसका चश्मा भी लौटा दिया। उसने प्रेम से कहा , " साहिब , चाहो तो मेरा चश्मा ले जाओ , हम बिन चश्मे के भी गाड़ी चला लेंगे , आप पढ़ने -लिखने वाले लोग है , रख लीजिये  , कुछ तो काम आएगा ". मैंने कहा , " शुक्रिया , पर रहने दो।  जहां भी मौक़ा मिलेगा नया चश्मा बनवा लूंगा " .

विमान पर सवार होने के ऐन पहले मोबाईल फोन का रिंग बजा।  सोचा किस अहमक को सुबहो -सुबह मेरी याद आ गई। मोबाईल फोन पर नाम , नंबर नज़र ही नही आ रहे थे. पता नहीं कैसे मित्र अजय ब्रम्हात्मज की जानी -पहचानी आवाज़ आने लगी- यह पूछने कि मैं यात्रा पर सही -सही निकल गया या नहीं। मैंने विमान में बोर्डिंग के लिए कदम बढ़ाने के साथ ही कॉल कटने -काटने के पहले इतना कह ही दिया , " सब ठीक है , पर चश्मा छूट गया "

विमान में पढ़ने के लिए बहुत पुराने साथी , प्रदीप सौरभ का सद्यःप्रकाशित उपन्यास , ' और सिर्फ तितली ' की वह प्रति बीती रात ही लैपटॉप बैग में अपनी दवाओं , पासपोर्ट आदि के साथ रख ली थी जो उन्होंने हाल में दिल्ली से मुम्बई आकर मुझे भेंट की थी।  प्रदीप का आग्रह था कि मैं यह उपन्यास पढ़ कर उसके बारे में कुछ लिखूं भी. घर में पेन्टिंग और नई साज़- सज़्ज़ा के तमाम सार्थक -निरर्थक काम के बीच वह उपन्यास नहीं पढ़ सका था. सोचा था  कि मुंबई से दिल्ली और दिल्ली से बागडोगरा तक की उड़ान में यह उपन्यास पढ़ भारत की सीमा से बाहर निकलने के पहले ही प्रदीप को फोन कर कह ही दूंगा , " हाँ भाई , पढ़ ली ". मगर… हाय रे तितली ! आह रे उपन्यास !! उफ ये कमबख्त वक्त , कमबख्त चश्मा !!!

मुंबई से दिल्ली के रास्ते भर सोचता रहा कि दृष्टिविहीन लोग ब्रायल लिपि  की बदौलत पढ़ -लिख सकते हैं लेकिन जिन नेत्र-दृष्टी युक्त लोगों को चश्मा चढ़ जाए वे बिन चश्मा क्या -क्या और कितने भर कैसे देखें. बचपन में अपने गाँव में बकरी चराती एक वृद्धा का स्मरण हुआ जिसकी आँखों पर टूटे-फूटे लेंस और कमानी का चश्मा चढ़ा था. उसका फूटा लेंस गोंद से चिपकाया हुआ था।  कमानी नाम भर की शेष थी जिसे उसने जूट की सूतली से जोड़ कानों पर बाँध रखी थी. मैंने साहस कर उससे पूछा था , "  इससे दिख जाता है क्या ? " उसने सहज भाव से कहा था ," बकरियों की गिनती करने लायक तो दिख ही जाता है ".

यह भी स्मरण हुआ कि मुझे बचपन से ही चश्मा चढाने की ललक थी।  सोचता था कि चश्मा मिल जाए तो पढ़ाई -लिखाई बेहतर हो जाएगी. स्कूल क्या , कॉलेज तक चश्मा लगाने का सौभाग्य नहीं मिला. जेएनयू के ज़माने में एक ख़ास दोस्त ने ऐम्स से लगे डा.  राजेन्द्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थल्मिक साइंसेज में संग जाकर मेरा पहला चश्मा महज़ 50 रूपये के खर्च पर बनवा दिया था. फिर हर कुछेक वर्ष पर तरह-तरह के फ्रेम, लेंस , फोटो ब्रॉउन , फोटो ब्लैक आदि रंग के नए-नए  चश्मे बनते रहे. मुंबई में छूटा प्रोग्रेसिव लेंस का बाईफोकल चश्मा मैंने वहीं फोर्ट में दादाभाई नारोजी रोड पर 1877 से चालू लॉरेंस एंड मायो दूकान से करीब दस हज़ार रूपये  के खर्च से अपने निलंबन के कुछ समय बाद बनवाया था। उसके बाद डायबिटिक करार दे दिए जाने के बावजूद नए लेंस की जरुरत नहीं पड़ी , अलबत्ता रांची में चश्मों की एक पुरानी दूकान , बी एन बैजल  ऑप्टिशिअन्स से जनवरी 2014 में बैक अप के बतौर एक साधारण चश्मा बनवाया था जिसका उपयोग करने की नौबत कभी नहीं पड़ी। वह कमबख्त बैक अप चश्मा भी मुम्बई में ही रह गया.

सोचते -सोचते राह गुज़र गई. पायलट की गर्वोक्तकारी घोषणा गूंजी कि उसने यह उड़ान निर्धारित समय से कुछेक मिनट पहले ही दिल्ली उतार दी है. दिल्ली से बागडोगरा की कनेक्टिंग उड़ान भरने में करीब ढाई घंटे की प्रतीक्षा करनी थी। ख़याल तो आया कि वसंत कुञ्ज वाले घर जाकर अपना -पराया , किसी का कोई पुराना चश्मा उठा ले आऊं।  शनिवार का दिन था , उस घर पर कोई ना कोई होगा ही। दिल्ली में 20 सितम्बर से 6 दिसंबर 2014 के अपने पिछले लम्बे प्रवास के दौरान ढेर सारा कचरा और फालतू सामान भरे उस घर को इंसानों के रहने लायक बनाने -बनवाने के दौरान वहाँ कई दर्ज़न पुराने चश्मे भी मिले थे. इनमें दिल्ली में कोई 25 वर्ष पहले बनवाए अपने भी चश्मे भी थे।  कुछेक अच्छे फ्रेम वाले चश्मों को छोड़ बाँकी सब फ़ेंक दिए थे।  एयरपोर्ट से वसंत कुञ्ज वाले घर जाने और वापस आने में बमुश्किल घंटा -भर लगता।  एयरपोर्ट से निकलने से पहले जब पूछ -ताछ की तो पता चला कि मैं बाहर तो जा सकता हूँ पर लौटना सुगम नहीं होगा क्योंकि दिल्ली से आगे की कनेक्टिंग उड़ान के लिए मेरा बोर्डिंग पास मुंबई में ही बना कर मुझे थमाया जा चुका है.
दिल्ली से बागडोगरा पहुंच कर मैंने काकारभित्ता बॉर्डर तक के लिए टैक्सी ली और उसके ड्राईवर से कहा ," रास्ते में जो नक्सलबाड़ी है ना  वहां थोड़ा रुकना है , चाहो तो थोड़े और पैसे ले लेना। " नक्सलबाड़ी पहुँच मैंने चाय पी , कुछ लोगों से संक्षिप्त बात की। बिलकुल साफ नज़र तो नहीं आ रहा था नक्सलबाड़ी और वहाँ के स्मारक।  फिर भी कुछेक फोटो क्लिक कर लिए। फिर उसी टैक्सी से भारत-नेपाल बॉर्डर स्थल , काकरभित्ता पहुँच गया. वहां से बिराटनगर के लिए दूसरी टैक्सी लेनी पड़ी।

बिराटनगर पहुँचते ही मेरी नज़र आँखों के एक अस्पताल पर पड़ी।  अस्पताल के बगल की एक गली में चश्मों की कई दुकाने थीं। .मुझे पता था कि वहां चीन में बने " रेडीमेड " लेंस मिल सकते हैं. एक दूकान पर बैठी महिला ने मुझे देखते ही पुकारा। वह क्षण में भाग कर अपने पति को बुला लाई जिसने आनन -फानन में मेरी दृष्टी की जांच कर दो  बाईफोकल लेंस मेरे सामने रख दिए और कहा , " लेंस को कीमत 150 रूपये भारू , फ्रेम को कीमत सौ रूपये भारू " मैंने  एक लेंस और फ्रेम पसंद कर उसे चश्मा बना देने कहा।  चश्मा बनाने के दौरान उसने पूछा कि मैं किसके यहां आया हूँ. मैंने अपने बहनोई का नाम केएन ठाकुर बताया तो उसने पूछा , " डा  ठाकुर ? " मैंने कहा , " उनके ही घर , मेरे बहनोई ही समझो , सगे बड़े भाई हैं मेरे बहनोई के ". उसने कहा , " आप पाहुन हैं , 50 रूपये भारू कम देना  ".  उसकी दूकान पर पहुँचने के 10 मिनट के भीतर मेरी आँखों पर नया चश्मा चढ़ गया था. मुझे भारू और मोरु करेंसी में अंतर साफ दिखने लगा था। लेकिन यह मुम्बई में  छूटे भारी मंहगे कमबख्त चश्मे का कमबख्त गरीब क्लोन ही था। 
कमबख्त वक़्त : 004

दीवार घड़ी की कमबख्त सूइयां !!


मुंबई , 04 -04 -2015
अच्छी ही नहीं हर बुरी चीजों का भी एक तार्किक और स्वाभाविक अंत होता है. वक़्त भी अंत से नही बच सकता - कमबख्त हो कि खुशवक्त. वक़्त क्षणभंगुर है. मेरे लिए कमबख्त वक़्त को विदा करना फिलवक्त सम्भब नहीं.जुर्रत कहें , ना कहें , मैं इस वक़्त - बुरे ही नहीं अच्छे वक़्त से भी विदा चाहता हूँ. नही जानता कहाँ -कहाँ और कब तक जाना है. फिर कभी लौटना संभव होगा कि नही बुरे या फिर अच्छे वक़्त संग. वक़्त के आर-पार जाने की ख्वाहिश क्या गुल खिलायेगी नहीं मालूम. आज सूर्योदय से पहले मुम्बई से कूच करना है.सो जगा रहा रात भर.ताकि वक़्त कम -से-कम आज सुबह बेवफाई ना करे उसके संग जो वक़्त से उसके आगे रहने की प्यार -भरी मिन्नत कर.

ये तस्वीर उस पूरब जापान में बनी कूकू दीवार घड़ी की कम्बख्त सुईयों को ख़ुशवक्त बना देने बाद की है , जहां समाज और बाज़ार दूसरों से पहले जगता है. जापान में सूर्योदय का वक़्त कमबख्त है - हर पूंजी  बाज़ार के वास्ते। इस दीवार घड़ी में मादा कोयल घर के भीतर से बाहर - हर घंटे-आध घंटे झाँक अपने बच्चों को वक़्त की ताकीद करती रहती है। अब सोना ही नहीं. महबूब शायर मजाज़ के लफ़्ज़ों में " रास्ते में दम लूँ ये मेरी आदत नहीं , और कोई हमनवां मिल जाए फितरत नहीं ".

अपने कमबख्त वक़्त का आज का ये वाक्या दर्ज़ करते वक़्त चाय की तलब होने पर किचन की तरफ जाते -जाते हॉल में , घर लाई दीवार घड़ी पर नज़र पड़ी. उसका वक़्त मुझे अटपटा लगा.सोचा , यह वक़्त रात के क्या ,दिन के भी 12  बजे का नहीं हो सकता।  समझने में देर नही लगी कि घड़ी की मिनट की सूई अटक गई है और इसलिए घंटे की सूई भी अटकी है. वक़्त के मिनट ,घंटे पर भारी पड़ते हैं. 

चाय बनानी छोड़  दीवार घड़ी की बिगड़ी सूइयां ठीक करने लगा और वे ठीक हो भी गयीं. यह दीवार घड़ी मैंने हाल में हासिल की थी. बचपन से ही अच्छी दीवार घड़ी खरीदने की सोचता रहा।  कभी खरीद नहीं सका. खरीदने के लिए वक़्त नहीं मिला यह कहना सही नही होगा,  पैसों की भी किल्लत नहीं थी. पर ऐसी किसी दीवार घड़ी पर कभी नज़र ही नही पड़ी जो देखते ही भा जाये. यह दीवार घड़ी भी मैंने खरीदी नही. किसी ने हमारी बिल्डिंग से अपने सारे माल-असबाब समेत कंही और जाते वक़्त फ़ेंक दिया था.मैंने बिल्डिंग के गार्ड से पूछा तो उसने कहा था ," कचरा है , भंगार वाला भी नही ले जाएगा ". मैं उसे उठा ले आया. कई घड़ीसाज़ के पास गया. सबने उसे ठीक करने से मना कर दिया। आखिर में एक घड़ीसाज़ मिला जो मुझे जानता था , यह भी जानता था कि मुझे पुराने वक़्त की चीजों को ठीक करने-कराने का शौक है. उसने कहा , " कभी इतना टेढ़ा काम नहीं किया।  आपके लिए करूंगा , ठीक हो गया तो आपका नसीब। यह एंटीक है, इसके पार्ट -पुर्जे अब नही मिलते। ठीक हो सके या नही खर्च बहुत होगा। बोलो क्या बोलते हो. "

मैंने उसी से दीवार घड़ी ठीक करवा ली. अपने पास वक़्त-ही-वक़्त- के आलम में उस पर खुद नेचुरल कलर में दो इंच की ब्रश से पॉलिश कर दीवार पर लगा दी थी. पर इसकी ग्लास-कवर विहीन सूइयां , गोल्डन कलर की नई कोटिंग कुछ ज्यादा हो जाने और उन पर धूलकण जम जाने के अतिरिक्त भार की वजह से अटक गई . मैंने धूल साफ कर मिनट की सूई मोबाईल फ़ोन पर दिखे वक़्त से मिला कर क्लॉकवाइज घुमानी शुरू कर दी. घड़ी पर बाहर  दिख रहीं कोयल के दोनों बच्चों और उनकी माँ की हर आधे घंटे पर संक्षिप्त एक बार और पूरे घंटे पर , जितना बजा हो उतनी बार , दीर्घ रूप से कूकने की आवाज फिर आने लगी। मेरे लिए कमबख्त वक़्त से विदाई की याचना की इससे अच्छी कूक नहीं हो सकती।

कमबख्त वक़्त: 003 

 

कमबख्त तुलसी

मुंबई 05 फरवरी 2015 : आज भी सूरज की पहली किरणें बिस्तर छूते ही जग गया. खुद पानी पीने से पहले घर में नए लगे दर्जनों पौधों को अपने बच्चों की तरह पानी देने का दायित्वबोध सर पर सवार था.अपने बच्चे तो बच्चे नहीं रहे और संग भी नहीं रहते अब. आज ही बेटा का जन्मदिन भी था. मन किया कि उसे फ़ोन करूँ. किन्ही कारणों से फ़ोन पर बधाई देने से रूक गया.एसएमस भेज दिया ,ये सोच कि जब फुरसत होगी तो देख लेगा.

बीते कुछ दिनों से लगता है कि पौधे बच्चे तो नहीं , बच्चों से कम भी नहीं. इस एहसास ने नींद से जगते ही चीता -जैसी नई स्फूर्ती भर दी है . नए ' बच्चों ' के लालन -पालन के लिए लगे रहने में अजीब खुशी मिलती है. किसान परिवार का हूँ. संयोग से विज्ञान स्नातक भी , वनास्पति शास्त्र में ' प्रतिष्टा ' और रसायन शास्त्र में विशिष्टता के साथ. संयोग- दुर्योग , जो भी हो ,आगे की पढ़ाई और अच्छी नौकरी के लिए दिल्ली जाकर जेएनयू में दाखिला लेने से पहले गाँव में साल भर खुद खेती भी की. लेकिन वनास्पति शास्त्र का अकादमिक ज्ञान , गाँव में ज्यादा काम नहीं आया. पौधों को  पानी देते-देते सोचने लगा कि गाँव की जमीनी हकीकत, किताबी ज्ञान से बिल्कुल भिन्न थी. यह भी कि गाँव में मीलों पसरे खेतों में हासिल व्यावहारिक ज्ञान , मुम्बई के संकुचित घर में लगे पौधों के सन्दर्भ में पूरी तरह से मेल नही खाता है. पौधों को जमीन ही नहीं नसीब होती यहां.
                            
पौधों को समुचित मिट्टी, पानी और धूप भी मयस्सर नही यहां.  नगरों का पर्यावरणीय , रासायनिक प्रदूषण , पेड़ -पौधों को लहलहाने देने में अलग समस्या खडी करता है. पढ़ रखा था कि पेड़ -पौधों की जान , जड़ से अधिक उनकी हरी पत्तियों में होती है. पानी , जड़ पीतीं हैं. धूप खाने का काम जड़ का नहीं ,पत्तियों का है. जड़ को समुचित पानी नही मिले तो पौधा सूख जाता है, मर जाता है. पानी ज्यादा मिले तो भी पौधा सड़ कर मर ही जाता है.पेड़ -पौधे भी सजीव ही तो हैं. इंसान की तरह उन्हें पानी ही नहीं पीनी , कुछ खाना भी है. पत्तियों को सूर्योदय से सूर्यास्त तक धूप खाने देने के पहले उनपर जमा मिट्टी , धूलकण आदि को पानी के हलके स्प्रे से साफ कर देने से पौधे संपुष्ट होते है.

कुछ दिनों से देख रहा था कि गेरू रंग के  गमले में लगाया तुलसी का नया पौधा मेरी तमाम कोशिशों के बावजूद मुरझा रहा है. उसकी छोटी -छोटी पत्तियों एक-एक कर सूख रही थी. मेरी एक महिला मित्र का कहना था हर घर में तुलसी नही टिकती. एक पुरुष मित्र ने पता नहीं किस आधार पर कह दिया कि जिस घर-आँगन में कोई महिला ना हो वहाँ कुछ भी कर लो तुलसी मुरझा ही जायेगी. बीते कुछ दिन कोर्ट कचहरी के चक्कर ज्यादा लगे , घर में भी नई रंगाई आदि के चलते काम बहुत बढ़ गए थे. ऐसे में तुलसी को मुरझा जाने से रोकने में विफल रहा. मैंने हाल में मित्रवत बने एक पेशेवर माली , मोहन दत्तात्रेय , को फोन पर अपनी बेहाल तुलसी के बारे में बताया था. उसने आज शाम हरी तुलसी का नया पौधा देने की बात कही थी. इसका स्मरण होते ही मैंने आज सुबह कमबख्त तुलसी के लगभग सूखे पौधे को गमले से उखाड़ कर डस्टबिन में फ़ेंक दिया. अच्छा नहीं लगा तुलसी को उखाड़ फेंक. बेटा का कोई जवाबी एसएमएस या फोन नही आया. मोहन माली भी नहीं आया. मन उदास हो गया. क्या करें.        

Thursday, August 27, 2015

कमबख्त वक़्त : 001

 आह री कलाई घड़ी


दो अक्टूबर 2010
आज की सुबह आज़ाद हिन्दुस्तान के बहुतेरे लोगों के लिए अलसाई -सी होती है. मेरे लिए कुछ ज्यादा ही अलसाई गुज़री जगने बाद वक़्त देखने की जहमत नहीं करनी पड़ी। बिन घड़ी देखे पुख्ता एहसास था - अब ना वक़्त मेरे साथ रहा और ना ही मैं वक़्त के संग.

ऐसा भी नहीं कि आज राष्ट्रीय अवकाश होने की बदौलत मेरा भी कार्यालय बंद था. वो तो मेरी पैदाइश के कुछेक बरस में खुल जाने के बाद कभी बंद ही नहीं हुआ.हिन्दुस्तान -चीन युद्ध और बाद के सभी युद्ध के दौरान भी हर हमेशा खुला रहा.दिवंगत इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में लागू आंतरिक आपातकाल में कम्पनी के सरकारी अधिग्रहण के बाद एक नई कम्पनी में विलय कर देने बाद भी 9 ,रफी मार्ग , नई दिल्ली अवस्थित हमारा कार्यालय बंद नहीं किया जा सका.

ऐसा भी नहीं कि मुझे आज कंही नही जाना था, घर ही नहीं कार्यालय के बाहर के भी काम बहुत थे.जगने के कुछ देर बाद घर से निकलने तैयार होने लगा. तैयारी में आदतन कलाई घड़ी भी हाथ में आ गई  कलाई पर बांधते वक़्त ठिठक गया. वक़्त साथ ना दे तो क्या बाँधना. किसी का ग़ुलाम नही  कमबख्त वक़्त. घड़ी चमचमा रही थी, कलाई पर बंधने मचलने - सी लगी. मैंने उसे नरम मूँज से बनी छोटी टोकरी में उस पेपरवेट के बगल मेज़ की आखरी दराज़ में रख दिया जो कभी अमीनाबाद , लखनऊ के एक स्नेही खबरनवीस ने खुद बना कर भेंट की थी.आज सुबह से काम से निलंबित हूँ , ' मेरा समय ' ठहर गया है

हाथ की घड़ी चल रही थी. गलत या सही यह जानने की जरुरत ही नहीं पड़ी।  लगता था कि ठहरे हुए समय में सही या गलत क्या देखना।  यह तो साफ था कि अगर घड़ी गलत चल भी रही होगी और ठहरे हुए समय में उसकी सुई सही करनी भी पड़ी तो कुछ फर्क नहीं पडेगा।  घड़ी तब भी कलाई पर नहीं बंधी होगी।  मेरा समय भी निलम्बित रहेगा , मेरी नौकरी की तरह।  पर निलम्बन के बाद कलाई से  उतार दी अपनी घड़ी जब कभी दिखी बड़ी प्यारी लगती थी। नई लगती थी. सबसे बड़ी बात कि वह बंद नही थी. मेरी कलाई पर बंधने के लिए सदा तैयार लगती थी। 

 प्रतिकविता

आत्म-पलायन के विरूद्ध


निकलो निकलो
बाहर आओ
खुद की खोह से

खुद में खुद तक
तिल-तिल जिओगे
घुट- घुट मरोगे
निकलो निकलो
बाहर आओ


आओ आओ
खुले में
सबके संग
जहां
ज़िंदा रहने
और मरने का भी
मतलब हो

निकलो निकलो
बाहर आओ
खोह में ओढ़े जाल से
काट दो
फ़ेंक दो
खुद बुना
खुद ओढ़ा
मकड़जाल
जहां
कैद है जीवन
जिसकी द्रुत
और विलम्बित विस्तार की व्याख्या में
उलझे रह जाओगे

निकलो निकलो
बाहर आओ
अँधेरे खोह से
जहाँ
भुगत-भोग रहे
मिथ्या जीवन के
मिथ्या दुःख सुख 
जहाँ
जीवन के भ्रम पाले हो 
जहाँ
दरअसल पसारे हो 
आत्म- पलायन के जाल 

निकलो निकलो
बाहर आओ
आओ आओ
खुले में खुलो
खुले में बुनो
जीवन के धागों से
अपना सबका संसार
बेहतर से बेहतर संसार
जहाँ
मिले और पले
सत्य जीवन
सम्पूर्ण जीवन
जहां
ना गुजरे 
बेमतलब की जिंदगी 
जहां ना मिले
अधमरे का संग
बेमतलब की मौत

आओ आओ
बाहर आओ
खुले में
जहाँ
खुल कर हंसो
खुल कर जिओ
खुल कर रोओ
खुल कर मरो

निकलो निकलो
बाहर आओ
मिथ्या अपराधबोध से
श्रम के निलंबन के 
मर्यादित 
और अमर्यादित प्रश्नों से
आओ आओ
खुले में
जहाँ
कुछ बनो
ना बनो
बन कर रहो
बन कर मरो
श्रम से परिपूर्ण इंसान
जहाँ
दायित्वबोध हो
जहां
तुम्हारे श्रम से
पैदा हों सपने
धरती और आकाश के
क्षितिज के
जीवन के
सृजन के
आनंद के
(प्रथम प्रारूप जेएनयू , दिल्ली 12 -12 -1984 :अंतिम प्रारूप इंडस्ट्रियल कोर्ट ,मुम्बई 02 -03 -2015

अजनबी- अपने-अजनबी


बाअदब

अजनबी- अपने-अजनबी






कभी अपने लगते अजनबी कभी अजनबी अपने-से
कंही ऐसा तो नही  हम हो गए गए अजनबी अपने से

मुंतज़िर था साथ जिनका क़यामत बाद भी कसम-से
फिर क्यों लगे हैं वो अजनबी क़यामत के पहले से

वज़न लम्हों का तौलें हुज़ूर किस बनिए की तराज़ू पर
कोई लम्हा भारी पड़ा क्या जिंदगानी के सारे लम्हों पर

 अपने बने अज़नबी और अज़नबी बने अपने में
कितना फासला होता है कभी पूँछ लूंगा दोनों  से

क्यों कोई अज़नबी अपना हो जाता है
अपना बन फिर अजनबी हो जाता है


अजनबियों के भी तो अपने -अज़नबी होते होंगे
कोई अज़नबी बताये कितने अपने-अज़नबी  देखे
(काठमांडू , सोमवार 30 अप्रैल 2015)

Saturday, August 22, 2015


हाशिये के किस्से : 11


किस्सा एकादशी उद्यापन का



मुझे नहीं पता था कि कौन-कौन से एकादशी व्रत होते हैं. ये भी नहीं पता था कि करीब सौ लोगों के पूर्ववर्ती संयुक्त परिवार में दादी के बाद सिर्फ माँ ने सभी परिजनों के लिए मनोकामना के साथ वर्षों के अपने एकादशी व्रत का उद्यापन भी किया . यह कहने की जरूरत नहीं कि मैं खुद को नास्तिक या आस्तिक क्यों नहीं मानता। 

एकादशी उधापन की कथा छह दिन चली। हर दिन कथा समाप्ति पर आरती के समय मैं माँ को नगद दे देता था और आरती में मिले सभी सिक्के रख कर उनके बदले पंडित जी नगदी थमा देता था.

माँ ने कहा ," ये
अच्छा लगता है.पुत्रदा एकादशी व्रत का पुन्य है . मगर किसी पुत्रवधू , पोत्र , पोत्री के ना आने का दुःख है ' .मैंने हंस कर कहा , " पुत्रवधू एकादशी का प्रावधान क्यों नहीं है ?"  बाद में उन्होंने बताया कि अब कोई दुःख नहीं , सबसे फोन पर बात हो गयी.

बाद में मित्र खुर्शीद अनवर ( अब दिवंगत) ने बताया कि नागार्जुन, रचनावली के खंड चार में सम्मिलित एक उपन्यास में एकादशी उद्यापन का ऊलेख है - शायद वह उनकी एक मैथिलि कृति का हिंदी अनुवाद है.


माँ की ईक्छा के अनुसार अनुष्ठान में कोई आडम्बर नहीं था , ' जनरेटर सेट ' के बजाय पारंपरिक साधनों और सोलर लाईट से काम चलाया गया. उन्होंने सारा खर्च अपनी पेंशन से जुटाया। हाँ , भूदान के लिए पुरखों से मिली भूमि का उपयोग किया गया. एक भूदान स्कूल खोलने के लिए भी किया गया। मुझे लगा कि धार्मिक कृत्य , सामाजिक सरोकार का भी सर्वनाम बन सकता है।

पंडित जी से मिली जानकारी के अनुसार एक तालिका निम्नवत है
एकादशी का नाम : मास : पक्षकामदा एकादशी : चैत्र :शुक्ल
वरूथिनी एकादशी :वैशाख :कृष्ण
मोहिनी एकादशी :वैशाख :शुक्ल
अपरा एकादशी :ज्येष्ठ :कृष्ण
निर्जला एकादशी: ज्येष्ठ :शुक्ल
योगिनी एकादशी :आषाढ़ :कृष्ण
देवशयनी एकादशी : आषाढ़ :शुक्ल
कामिका एकादशी :श्रावण :कृष्ण
पुत्रदा एकादशी : श्रावण :शुक्ल
अजा एकादशी :भाद्रपद: कृष्ण
परिवर्तिनी एकादशी :भाद्रपद :शुक्ल
इंदिरा एकादशी :आश्विन :कृष्ण
पापांकुशा एकादशी :आश्विन :शुक्ल
रमा एकादशी :कार्तिक :  कृष्ण
देव प्रबोधिनी एकादशी :कार्तिक :शुक्ल
उत्पन्ना एकादशी :मार्गशीर्ष :कृष्ण
मोक्षदा एकादशी : मार्गशीर्ष :शुक्ल
सफला एकादशी : पौष :कृष्ण
पुत्रदा एकादशी :पौष :शुक्ल
षटतिला एकादशी :माघ : कृष्ण
जया एकादशी : माघ :शुक्ल
विजया एकादशी :फाल्गुन :कृष्ण
आमलकी एकादशी :फाल्गुन : शुक्ल
पापमोचिनी एकादशी :चैत्र :कृष्ण
पद्मिनी एकादशी :अधिकमास :शुक्ल
परमा एकादशी :अधिकमास : कृष्ण
                                                                    

पंडित जी की कथा में कई रोचक जानकारी मिली। जैसे कि भीम बिन खाए नहीं रह सकते थे पर उनके लिए भी एकादशी व्रत का शास्त्रसम्मत ' उपाय ' कर दिया गया. लेकिन मेरे ये पूछने पर कि डायबिटिक लोग कैसे ये व्रत रख सकेंगे पंडित जी ने कहा , " शास्त्र में इसका वर्णन तो नहीं है !!"

लक्ष्मण के कौव्वे

  हाशिया के किस्से:

 लक्ष्मण के कौव्वे


दिसंबर 1985  में मुम्बई में कांग्रेस का शताब्दी अधिवेशन हुआ था. बतौर पत्रकार कांग्रेस  अधिवेशन की खबर लेने -देने मैं मैं पहली बार मुम्बई पहुँचा  था. एक सुबह कोई अंग्रेजी अखबार पढ़ पता चला कि जहांगीर आर्ट गैलरी में आर के लक्ष्मण  के  रेखाचित्रों की  प्रदर्शनी लगी हुई है . हम चर्चगेट के पास एम्बेसडर होटल में ठहरे हुए थे. नहा -धो - नाश्ता निपटा होटल वालों से आर्ट गैलरी का पता किया तो पहुंचा तो वहां कौव्वे ही कौव्वे नज़र आये.मनुष्य के नाम पर सिर्फ लक्ष्मण दिखे उनसे घंटे भर बात हुई.

लक्ष्मण ने देखते ही पूछा, ' यहाँ कैसे ?' मैंने उन्हें पूर्ण आदर के साथ अपना परिचय दिया और कहा, ' पता चला आप यहाँ होंगे, सो चला आया.बचपन से आपके कार्टून देखता रहा हूँ , आपको कभी देखा -सुना नहीं था. किंचित मुस्कान के साथ उन्होंने कहा , 'मुझे नहीं इन कौव्वों को देखो और बोलो क्या लगता हैं तुम्हे इनको देख कर?'

मैंने कहा , 'झूठ क्या बोलूं , मुझे तो यहाँ क्या, सभी जगह सारे कौव्वे एक जैसे लगते हैं '. वो बोले , ' एक जैसे ना , एक नहीं ना ! एक जैसा बोला तो एक बार फिर सबको गौर से देखो और मुझे बोलो क्या लगता है'. कुछ देर तक उनके रेखाचित्रों में मौजूद कव्वों का अवलोकन कर कुछ सकुचाते हुए मैंने कहा , 'मुझे कोई कौव्वा अलग-थलग दिखा ,कोई समूह में, एक खामोश देवदास जैसा था और एक तो बिलकुल आवारा लग रहा था' .

लक्ष्मण हंस पड़े. फिर कहा , 'सही पहचाना तुमने उन सबको, ये सब हमारी तरह ही हैं और हम लोग जैसे-जैसे हैं ये कौवे भी उसी तरह लग सकते हैं '.मुझसे नहीं रहा गया और बोल गया , 'कौवा तो बदरंग जीव है , बहुत लोगों को कौवा अछूत लगता है , आपने अपने रेखाचित्रों के लिए ये प्राणी ही क्यों चुना ?' वह मुझे थोड़ा डांटने के स्वर में बोले , 'दोष तुम्हारा नहीं , तुम्हारी दृष्टि का है. देखा ठीक , बोला भी ठीक , पर अब सवाल सही नहीं कर रहे .

मैं चुप हो गया और उनको टुकुर -टुकुर देखने लगा .लक्ष्मण शायद ताड़ गए कि मैं अब कुछ भी नहीं बोलूंगा , सिर्फ देखूंगा और सुनूंगा। सो वो बोलने लगे और मैं बस सुनता - देखता रहा . उनकी कही सौ बातों में से एक बारीक बात थी , ' पक्षियों में सबसे ज्यादा मानवीय कोई है तो वो कौव्वा ही है , क्योंकि वही मानव के सबसे ज्यादा करीब है". ( प्रथम प्रकाशन : युवकधारा , नई दिल्ली 1986 , संपादित अंतिम प्रारूप 20 जनवरी 2015 )

एक था मफलर -1

हाशिया के किस्से  :
 एक था मफलर - 1



हुआ यूं कि किसी ख़ास दोस्त ने एक मफलर खुद बुन मुझे सप्रेम पहना दिया. वो मफलर यूं  गले पड़ी कि पूछो मत.गज़ब का विश्वाश था उस मफलर को खुद पर और गले मिलने बाद शायद मुझ पर भी. इस मफलर के कई किस्से हैं. एक किस्सा सरे आम सुना दूँ तो गैर-मुनासिब नहीं.

कभी किसी रोज मेरे पास एक ढेला भी नहीं था. सुबह से भूखे मुझे किसी और दोस्त ने जेएनयू ओल्ड कैम्पस लाइब्रेरी की कैंटीन में लंच वखत फकत दो रूपये खर्च कर राज़्मा - चावल खिला देने की कृपा कर दी. शायद गले पड़ी उस मफलर को देख. 

वहाँ से दोपहर बाद जेएनयू की बस से मुफ़त में मंडी हाउस स्थित सप्रू हाउस लाइब्रेरी पहुँच गया. लाइब्रेरी में पढ़ना तो था नही. कुछ पैसों की जुगाड़ में मंडी हाउस पहुंचा था. सो वहाँ से जुगाड की फिक्र में बगलगीर - जेएनयू के ही गोमती गेस्ट हाउस चला गया. मेरे काम आने वाला कोई भी वहां नहीं मिला .वहाँ कैंटीन चलाने वाले मित्रवत मोहन भाई भी नहीं मिले. जेएनयू बस की मुफत  सेवा से वापस लौटने का वक़्त गुज़ारना मुश्किल लग रहा था. शाम ढलने में बहुत वक़्त बचा था. क्या करूँ , क्या ना करूँ - इस उधेड़बुन में चाय की तलब लगी.

ये सोच ' त्रिवेणी' पहुँच गया कि शायद वहाँ जान-पहचान का कोई मिल जाए.जेएनयू के ही दो मित्र वहां बैठे दिखे. मुझे देखते ही उनकी बांछे खिल गई. उन्हें देख मेरी भी .मैंने उनके पास पहुँच कहा , " चाय पिलाओ" . उनमें से एक मित्र ने , जो अभी दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रोफ़ेसर बन चुके हैं , कहा , " अमां यार , सिगरेट तक का जुगाड़ नहीं ". दूसरे मित्र ने , जो बाद में कंही और प्रोफ़ेसर बन अब दिवंगत हो चुके है , बड़े प्यार से कहा , " तुम्ही कुछ करो ना अब ". मैं उनके साथ बैठ सोचने लगा.  वो दोनों मुझे टुकर- टुकर  देखने लगे .

थोड़ी देर में एक व्यक्ति हमारे पास पहुंचा. उसने मुझसे पूछा , " व्हाट'स योर सिटींग फी " .मैं समझा नहीं , सो कुछ बोला नहीं. लेकिन मेरे दोनों मित्र समझ गए कि कोई जुगाड़ होने वाला है. उनमें से एक ने , जिन्होंने प्रोफ़ेसर बनने से पहले दिल्ली में द स्टेट्समैन में नौकरी की थी , बहुत नम्र स्वर में और उच्चारण-दोष-मुक्त अंग्रेजी में उस व्यक्ति से जो कहा उसका लब्बो -लुबाब था कि जितना भी देंगे चलेगा , ये आपका काम कर देगा.

 मैंने उस मित्र को हिंदी में टोका , " पर करना क्या है , ये तो पता चले " . उस व्यक्ति ने अंग्रजी में ही मुझसे कहा , " इट्स अर्जेंट. वी नीड यू फॉर मॉडलिंग . इट वोंट टेक मोर दैन 30 मिनट्स . वी हैव स्टूडियो इन बेसमेंट.  शैल पे योर फी. "

मैंने मन-ही-मन कुछ गणित जोड़ उनको अंग्रेजी में जो कह डाला उसका लब्बोलुबाब था - 500 रूपये नगद लूंगा , 100 रूपये अड्वान्स. यहीं चाय,  पकोड़े के लिए. उस व्यक्ति ने मुझे 100 -100 के पांच नोट थमा दिए (तब 500 रूपये के नोट नहीं होते थे ) और कहा , " शैल पे आल ऑफ़ योर कैंटीन बिल " . उन्होंने  वेटर को बुला कर हिन्दी में कहा , " ये लोग आज यहाँ जो भी खाएं -पीयें सबका पेमेंट मुझसे ले जाना. फिर उन्होंने मुझसे कहा , " शैल बी बैक इन 10 मिनट्स टू टेक यू अलोंग फॉर मॉडलिंग".

उस व्यक्ति के जाते ही दोनों मित्र ख़ुशी से उछलने लगे . एक ने कहा , " पैसे ज्यादा मांग लिए. मॉडलिंग कभी की है क्या? ठीक से करना वर्ना ये पैसे भी वापस ले लेगा. दूसरे ने कहा , " पैसे तो और भी मिल सकते हैं. ऱम , व्हिस्की जो भी पीनी है बोलो और पैसे दो. जब तक तुम मॉडलिंग करोगे हम दोनों यहीं कंही से खरीद लाएंगे , गोमती में बैठ लेंगे , वहीँ कैन्टीन में खाना भी खा लेंगे और फिर रात में जेएनयू निकल लेंगे" . मैंने उन्हें 200 रूपये देकर कहा , " मेरे लिए एक क्वार्टर या हाल्फ डबल माल्ट व्हिस्की , अपने लिए चाहो तो ओल्ड मोंक की पूरी बॉटल ले लेना , दो पैकेट विल्स नेवी कट सिगरेट भी " .