Friday, July 15, 2016

फ़ैज़ का आख़िरी कलाम

बाअदब 

 

 

फ़ैज़ का आख़िरी कलाम


बहुत मिला न मिला ज़िन्दगी से ग़म क्या है
मताए-दर्द बहम है तो बेशो-कम क्या है

हम एक उमर से वाकिफ़ हैं अब न समझाओ
कि लुतफ़ क्या है मेरे मेहरबां सितम क्या है

करे न जग में अलाव तो शे'र किस मकसद
करे न शहर में जल-थल तो चशमे-नम क्या है

अजल के हाथ कोई आ रहा है परवाना
न जाने आज की फ़ेहरिसत में रकम क्या है

सजायो बज़म ग़ज़ल गायो जाम ताज़ा करो
बहुत सही ग़मे-गेती, शराब कम क्या है

तालिबान के नाम

Poems of Resistance  

 तालिबान के नाम  (ये पहली और आखिरी तुकबंदी ) : खुर्शीद अनवर



दीन - ओ - धरम के तु खुदा

इस सर जमी के अम्बिया

बन्दूक का परचम लिये

नारा उठा इंसाफ का

अल्लाह के जाँ नशीं

उस के ही घर के ये अमीन

बारूद की सौदागरी

इनकी इबादत है यही

लाशों के कारोबार में

खुद के रचे बाजार में

कुर्आन की आयत रचते हैं

लाशों पे उनको लिखते हैं


शैतान सिफअत मनहूस रू

फिर से खड़ा हे रूबरू

इंसान का हाथों में लहू

करता है इससे यह वजू


इनकी इबादतगाह में

राक्षस इमामत करते हैं

सजदों में पेशानी  मगर

मंसूबे  दिल में पलते  हैं

 बारूद के लाइकी सदा

चिंगारियों  की कहकशां

नफरत भरे उपदेशों में

परमाणु की ये मोशिकियाँ

जिन हातों में तालीम के

जाम - ओ – सुबू दरकार थे

इस खाक पर जन्नात बने

रचने  के दावेदार थेr

उन हाथों में बारूद की

बू रच गयी क्यों नागहाँ

ये नौनिहाल - ए - ज़िंदगी

गम हो गये जाने कहाँ

इंसानियत पईन्दा है

इनसान फिर भी जिंदा है

उठने को अब ललकार है

चिंगारी बस दरकार  है

मंसूर फिर से आएगा

फिर अनलहक दुहराएगा

सूली तो होगी हाँ मगर

ज़ालिम का होगा उस पर सर

( मरहूम खुर्शीद अनवर )

Riddle No. 12

  


Riddle No. 12
To understand better why  not  " Bharat Maata ki jai " , those opposed to it must read Riddle No. 12 " Why did the Brahmins dethrone the Gods and entrhrone the Goddesses ? " We must read again and again authentic writings of Ambedkar at it's need of time to lambast attempts to appropriate him by the RSS.

It's authentic book of Dr. Babasaheb Ambedkar writings and speeches presented to somebody close to me by somebody who was instrumental in publication of all the volumes of this work. For those friends who don't have this book ,  reproducing  fantastic extracts from Riddle No. 2 .

From introduction of this volume by editors of Dr. Babasaheb Ambedkar Source Material Publication Committee Maharashtra State 

QUOTE " These are the unpublished writings of Dr Ambedkar which were in the custody of the Administrator General and the custodian of Dr. Ambedkar's property......After his death , in 1956 , all the papers including his writings were taken into custody by custodian of the High Court of Delhi. Later , these papers were transferred to the Administrator General of the Government of Maharashtra. Since then five iron trunks containing the unpublished manuscripts of Dr Ambedkar and several other papers were in the custody of the Administrator General.......After the formation of this committee and the appointment of Shri Vasant W .Moon as officer on special duty in 1978 , personally contacted the legal heirs of Dr. Ambedkar to secure the unpublished writings of Dr. Ambedkar and to publish them as material of historical importance. ...all consented to the Government project for publication.....Shri M B Chitnis , who , as a close associate of Dr. Ambedkar , was intimately familiar with the latter's handwriting ....and was Chairman of the editorial board spent a fortninght identifying which of the papers were Dr. Ambedkar's manuscripts...that also contained 26 of " Riddles in Hinduism " UNQUOTE


A link < https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10153477380075718&set=pb.645895717.-2207520000.1468566706.&type=3&theater >

Thursday, July 14, 2016

गांधी हम शर्मिन्दा है

फुटनोट : 15 नवम्बर 1015





स्वतंत्र भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की फिर ह्त्या कर ही दी आज सरे आम , आज़ाद हिन्दुस्तान के पहले आतंकवादी नाथूराम गोडसे के ' भगवा भक्तों ' ने । मोदी सरकार सच में सहिष्णु है. अवाम भी क्या इतनी ही सहिष्णु है ?

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के कामकाज के प्रति आलोचना -विरोध में फेसबुक पर लिखने वालों को ही नहीं उनके लिखे को महज़ ' लाइक ' करने वाले बच्चों तक को पुलिस यत्र -तत्र , पकड़ -धकड़ जेल ढूंस देती है.

गोडसेवादियों ने आज बाकायदा अपने वेबसाईट का श्रीगणेश कर दिया।  सोशल मीडिया , भरा -पड़ा है उनके कूड़े -कचरे से।

 मीडिया से बाहर और भी बहुत कुछ चल रहा है. क्या समय आ गया है!!  गांधी को राष्ट्रदोही और उन्हें मारने वाले को लाइक करने वालों की तैयार फ़ौज़ की कवायद पर " राष्ट्रवादी - देशभक्त " खेमा मज़े में है. खानापूर्ती के लिए आरएसएस ने बस बयान दे दिया कि इसमें उसका हाथ नही. मोदी सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है. गांधी हम शर्मिन्दा है. 
 Link <http://www.thehindu.com/news/national/hindu-mahasabha-launches-a-website-for-nathuram-godse/article7880713.ece >

बाअदब - खुशबख्ती

बाअदब


खुशी में अपनी खुशबख्ती कहाँ मालूम होती है
 कफस में जा के कद्रे आशियाँ मालूम होती है
(आनन्द  नारायण मुल्ला)

जंगल में मोर

 जंगल राज: 01

 

ये मोर बिहारी है , हमारी तरह. पूरी शान और तान में फोटो खिंचवाने बाद उसका अभिव्यक्त  भाव हम समझ गए. मोर की तरफ से ट्वीट करते तो यही कि ,  ' जंगल (राज )से यूं बैर-भाव  क्यूँ ? "

Tuesday, July 12, 2016

बाअदब : संगीत



बाअदब
 संगीत है तो बहुत कुछ है
ख़ुशी में क्या ग़म में भी

ना हो संगीत फिर क्या है
गम में क्या ख़ुशी में भी

देश पर संघी फासीवाद का खतरा है

पुनरावलोकन :

 देश पर संघी फासीवाद का खतरा है
(संडे मेल , नई दिल्ली  , 16 मई 1993 में ' खुली बहस ' का प्रथम अालेख )




एक बात साफ है कि अारएसएस कोई सांस्कृतिक संगठन नहीं है. उसके उदेश्य राजनीतिक हैं. अयोध्या मामले को गौर से  देखने पर पता चल  जाता है कि अारएसएस ने खुद भी अपने राजनीतिक उदेश्य काफी हद तक सबके सामने रख दिए हैं. यह उदेश्य है हिंदुस्तान को ' हिन्दू राष्ट्र ' बनाना। पर  ' हिन्दू ' और ' राष्ट्र ' का उसका  वह मतलब नही है जो अाम लाग समझते है.

अारएसएस की स्थापना 1925 में ' डॉक्टर जी ' ( के. बी. हेडगेवार ) ने की थी।  पर उसे वैचारिक एवं संगठनिक अाधार ' गुरु जी ' ( एम एस गोलवलकर ) ने प्रदान किया. गुरु जी की एक पुस्तक है ' वी एंड आवर नेशनहुड डिफाइंड ' जो पहली बार 1939 में छपी थी. कुछ लोग़ इसे अारएसएस का बाइबिल  कहते हैं. इस पुस्तक से और अारएसएस के पिछले 68 वर्ष की गतिविधियों पर गौर  करने से स्पष्ट हो जाता है कि उसके लिए ' हिन्दू ' का मतलब ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था अऊर ' राष्ट्र ' का मतलब ' हिटलरी फासीवाद का हिन्दुस्तानी स्वरूप है.

अारएसएस की स्थापना महाराष्ट्र में ब्राह्मणवाद  के खिलाफ सशक्त अांदोलनों की प्रतिक्रिया में सवर्ण जातियों द्वारा हिन्दू के नाम पर  अपना प्रभुत्व बहाल करने के लिए की गई थी।  ये अांदोलन 1870  दशक में ज्योतिबा फुले के नेतृत्व में ' पिछड़ी ' जातियों ने और 1920 के दशक में डा. भीमराव अाम्बेडकर की अगुवाई में दलितों ने छेड़े थे. ये महज संयोग नही कि अारएसएस के अब तक के सभी प्रमुख महाराष्ट्र के ब्राह्मण रहे है ( बाद में 1994 में एक गैर ब्राह्मण लेकिन सवर्ण ही ( ठाकुर / क्षत्रीय) राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया अारएसएस के चौथे प्रमुख बने जो उत्तर प्रदेश के थे. )

अारएसएस  के वैचारिक अाधारों पार् अॉर बात करने से पहले उसके सांगठनिक तंत्र को समझ लेना अच्छा रहेगा।  अारएसएस के ' अखिल भारतीय सह बौद्धिक प्रमुख ' कौशल किशोर की "  प्रेरणा " से 1992  में " लक्ष्य एक कार्य अनेक ' नाम की एक एक पुस्तक छपी।  इस  अनुसार अारएसएस   नियंत्रण में  भारतीय स्तर के 25 अॉर प्रांतीय स्तर के 35 संगठन हैं. इनमें भारतीय जनता पार्टी , विश्व हिन्दू परिषद , भारतीय मजदूर संघ , अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अॉर विद्या भारती प्रमुख है. इसी पुस्तक के अनुसार  देश भर के 25 हज़ार स्थानों पर अारएसएस की नियमित शाखाएं लगती हैं।  इन शाखाओं की एक महत्वपूर्ण भूमिका ' राष्ट्र  हिंदूकरण अॉर  हिंदुओं के सैन्यकरण की कार्यनीति को अागे बढ़ाना है।  जैसा कि पुस्तक  शीर्षक से ही स्पष्ट है अारएसएस के जितने भी संगठन , समितियां अॉर मंच हो सबका  लक्ष्य है अॉर वह वही ' हिन्दू हिटलरी राष्ट्र ' है।

आज़ादी के किस्से - 01

आज़ादी के किस्से - 01
ब्रिटिश शासकों की गुलामी से भारत की आज़ादी की स्वर्ण जयंती वर्ष में मेरे सम्पादक ने फ़ोन कर कहा , ' हम इस उपलक्ष्य में ख़बरों की नई श्रृंखला शरू कर रहे हैं.  लिखाड़  हो , जेएनयू वाले भी हो , कुछ तो लिखो आगाज़ करने ".

मैंने कहा , " लिख दूंगा , पर शर्त है - कंही आपकी कोई सी भी छोटी -बड़ी कैंची ना चले मेरे लिखे पर ". वो हंस पड़े और प्यार से बोले , " कभी तेरे लिखे में विराम , अर्धविराम तक पे हमने कोई कैंची आज़माई है , तू लिख , कुछ ऐसा लिख आज़ादी के बारे में कि सब बोले तेरे जैसा और कोई नही हम खबर देने वालों की दुनिया में '.

मैंने कहा , सर जी , तनिक धीरज धरो , आप अपनी श्रृंखला शुरू तो करो , ऎसी छोंक लगाऊंगा उसमें कि हम सब छक कर जियेंगे और मरेंगे उस किस्से पर , आज़ादी की कसम "

उन्होंने कहा , " देर ना करना , इसी महीने लिख भेजो " .

मैंने कहा , " इसी दिन तो नहीं , इसी हफ्ते लिख भेज दूंगा।  आयडिया पहले से था इसे लिखने का और दस्तावेज़ भी जुटा रखे हैं , बस आपका आग्रह चाहिए था और वायदा कि उस पर आपकी कैंची चाहे -अनचाहे भी ना चले।  आलेख भेज दूंगा , दस्तावेज़ किताबों में है जो आपको क्या किसी को नहीं दूंगा।  पर आप चाहो तो किताब देख सकते हो मेरे पास आकर

असत्य के प्रयोगकर्ता का समकालीन सर्वनाम नरेंद्र दामोदरदास मोदी

 
 
 
असत्य के प्रयोगकर्ता का समकालीन  सर्वनाम है  नरेंद्र दामोदरदास मोदी :  01

असत्य के प्रयोगकर्ता का समकालीन  सर्वनाम है - नरेंद्र दामोदरदास मोदी।  पहला प्रयोग तो कब किया पैदा होने के बाद पता नहीं।  हाँ , ये पता हैं उन्होंने इसका सबसे बड़ा प्रयोग राष्टीय स्वयंसेवक संघ के साथ किया , अपने को अविवाहित बता उसका " सर्वश्रेष्ठ " प्रचारक बनने।  फिर लाल कृष्ण आडवाणी जी की सोमनाथ से अयोध्या की " रथयात्रा के सारथी " बन उनका असत्य का प्रयोग बढ़ता ही गया।  गुजरात के मुख्य्मंत्री बन जाने के बाद  असत्य के प्रयोग की पींगे और बढ़ गईं।  उन्होंने गोधरा काण्ड के तुरंत बाद राज्य में नया चुनाव कराने की अपनी ख्वाहिश में रोड़ा बने तब के मुख्य निर्वाचन आयुक्त जेम्स माइकल लिंगदोह  को सार्वजनिक सभा में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया की तरह क्रिश्चियन बोल हिंदुत्व की हुंकार भरी।   लिंगदोह साहब ने अगले दिन सिर्फ इतना कहा कि जो नहीं जानते कि वह नास्तिक हैं उनसे उनको कुछ नहीं कहना   फिर तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सख्त हिदायत के बाद मोदी जी ने असत्य के अपने उस प्रयोग के लिए सार्वजनिक माफी मांग ली।  मगर गोधरा काण्ड बाद गुजरात में नया चुनाव तत्काल कराने की अपनी ख्वाहिश पर लिंगदोह साहब की रोकथाम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में फ़रियाद कर डाली जिसने उनकी एक ना सुनी और लिंगदोह साहब की इस बात को सही टहराया कि गोधरा काण्ड के तुरंत बाद राज्य में नया चुनाव, स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से नहीं कराया जा सकता।  मोदी जी के असत्य के प्रयोग की सुप्रीम कोर्ट में वह पहली हार थी।  पर वह कहाँ मानने वाले असत्य के अपने प्रयोग के लिए। 
जब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि चुनाव के हर प्रत्याशी को अपनी ही नहीं अपनी पत्नी तक की आय -सम्पति के विवरण के किसी भी बिंदू को निरुत्तर नहीं रखना होगा तो मोदी जी ने पहली बार 2014 के चुनाव में अपने नामांकन -पत्र के साथ दाखिल शपथ -पत्र में अपनी पत्नी के बतौर यशोदा बेन का नाम भरा।  दुनिया चौंक गयी पर मोदी जी तो , मोदी जी कत्तई नहीं सम्भले।  असत्य के प्रयोग करते गए। 

काला धन अाये कहां से ? काला धन जाए कहां रे ?


पुनरावलोकन


 
काला धन अाये कहां से ? काला धन जाए कहां रे ?
 ( पींग ( पाक्षिक ) , रोहतक ( हरियाणा ) 16 मई 1985 )

भारतीय अर्थव्यवस्था में काला धन या काली अर्थव्यवस्था का पदार्पण द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुअा. उन दिनों कुछ अावश्यक चीजों की राशनिंग और कंट्रोल की वजह से चीजों में चोरबाजारी की शुरुअात हुई. चोरबाजारी से शुरू हुए इस धंधे ने पहले काला बाज़ार और फिर काली अर्थव्यवस्था का रूप धारण किया. अाज़ादी के बाद इस काली अर्थव्यवस्था का धीरे -धीरे विस्तार होता रहा और जब इसने अाधिकारिक अर्थव्यवस्था की बराबरी प्राप्त कर ली तो अर्थशास्त्रियों ने इसे समानांतर अर्थव्यवस्था का नाम दे दिया.

काली अामदनी , कालाधन , काली अर्थव्यवस्था , भूमिगत अर्थव्यवस्था , गैरकानूनी अर्थव्यवस्था और समानांतर अर्थव्यवस्था जैसे कई नामों वाली इस बीमारी के प्रति जनसाधारण में समझ स्पष्ट नहीं है. जनसाधारण की समझ में काला धन वह धन है जो बक्सों में बँद अथवा सट्टे या गैर कानूनी कार्यों में लगाया जाता है. पर यह तो काले धन का अंशमात्र है. काले धन के बहुत बड़े भाग का उपभोग बैंक जमा सहित वितीय संपत्ति उपलब्ध करने में किया जाता है. कर वंचित अाय की एक विशाल धनराशि बैंकों में जाती है अऊर फिर बैंकों द्वारा सरकार सहित अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में अार्थिक सहायता देने में लगाई जाती है. कानून द्वारा निर्धारित कर देने के बाद बचे पैसे की सीमा से अधिक पैसा , या कर न देकर जमा किया हुअा धन काला धन कहलाता है.

अाज़ादी के बाद इसमें काफी वृद्धि हुई है जिसका कोई हिसाब - किताब या लेखा -जोखा नहीं है. सरकारी अांकड़ों के अनुसार देश का सकल उत्पाद 5 प्रतिषत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रहा है। जबकि बैंकों में जमा राशि प्रतिवर्ष 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. इस विरोधाभास का कारण काला धन ही है.

श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने जब 1969 में 14 बड़े व्यापारी बैंको का राष्ट्रीयकरण किया था तो उस समय बैंकों में कुल 4665 करोड़ रुपये ही थे. दिसंबर 1984 तक बैंको में जमा रकम बढ़कर 70 हज़ार करोड़ रुपये हो गई। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में उसके अार्थिक विकास के अनुपात से अगर अधिक रकम जमा हो तो यैह इस बात का सबूत है कि उस देश में कोई समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है.

 कालाधन कई तरीकों से बनता है जिनमें करों में चोरी , नाज़ायज़ कमाई , तस्करी   और प्रशासनिक भ्रष्टाचार प्रमुख हैं. पर सबसे अधिक कालाधन उत्पादन प्रणाली से ही अाता है और इसी में सबसे अधिक काला धन लगा भी हुअा है. व्यापारियों और उद्योगपतियों का गठजोड़ जिस प्रकार जितना अधिक पैसा जमा करता है उससे कालेधन की मात्रा उतनी ही अधिक बढ़ती है.

हमारे देश में कालाधन क्यों बनता है ? इस संबंध में अर्थशास्त्रियों के बीच मुख्यतः तीन तरह के मत प्रचलित हैं. पहली धारणा के अनुसार जब करों की दर अधिक होती है तो व्यक्ति करों की चोरी करने लगता है जिसके फलस्वरूप कालाधन बनता है. पर डा. के.एन. काबरा जैसे कुछ अर्थशास्त्रियों का मत है कि करों की दर में  कमी होन से कर वसूली में कोई खास असर नहीं पड़ता बल्कि कर वसूलने वालों को सुविधा ही प्राप्त होती है. उदाहरण के लिए 1971 -72 से 1978 -79 की अवधि में करों की दर में उत्तरोत्तर कमी के बावजूद निम्न अाय सीमा के अनुपात में उपरी अाय सीमा के लॉगऑन द्वारा दिए जाने वाले करों की कुल राशि में वृद्धि नगणय थी.

दूसरे मत के अनुसार कंट्रोल , कोटा , परमिट और लाइसेंस प्रणाली के कारण कुछ वस्तुओं का वितरण सही ढंग से नही  हो पाता है. फलस्वरूप इन वस्तुओं की अापूर्तो कम पड जाती है और कालेधन की बनने की जमीन तैयार होती है. पिछले दो दशकों से चीनी , जूट , स्टील , और सीमेंट जैसे उद्योगों के उपर लगाए गए कंट्रोल के कारण कालेधन के बनने की प्रक्रिया में वृद्धि हुई है. अर्थशास्त्र पार् अनुसंधान करने वाले संस्थान ( नेशनल इंस्टिट्यूट अॉफ एप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च ) के हाल ही में किए एक अध्ययन के अनुसार सिर्फ 9 वर्ष में इन वस्तुओं के उपर लगाए गए कंट्रोल ने 844 करोड़ रुपये का काला धन पैदा किया.

वांचू समिति और गाडगिल कमिटी ने भी स्वीकार किया कि कन्ट्रोल , कोटा , और लाइसेंस प्रणाली के कारण प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में कुछ ऐसे अधिकार अा जाते है जिसके फलस्वरूप भ्रष्टाचार बढ़ता है और कालाधन बनता है.

तीसरे मत के अनुसार राष्ट्रीय राजनीति भी काला धन को बढ़ावा देती है. यैह सर्वविदित है कि चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक दलों को धन की जरूरत पड़ती है. इसके लिए सियासी पार्टियां , उद्योगपतियों और व्यापारियों द्वारा दिए चंदे पर निर्भर करती हैं. चंदे की बड़ी -बड़ी रकमें कालेधन का ही एक हिस्सा होतीं हैं. राजनीतिक दलों में सत्तारूढ़ दाल को खास तौर पार् चंदा देने वाले व्यापारी और उद्योगपति जानते है कि उनकी काली कमाई के बल पर जीतने वाला दल काले धन के खिलाफ भौंक तो सकता है पर काले डान के रखवालों को काट नहीं सकता है. 1968 में सरकार ने राजनीतिक दलों को व्यापारी वर्ग से मिलने वाले चंदे पर रोक लगा दी थी. इसके बावजूद राजनीतिक दलों को परोक्ष रूप से पूंजीपति वर्ग से चंदे मिलते रहे.

1985 -86 के बजट प्रस्ताव में इस बात का प्रावधान रखा गया कि व्यापारी कर चुकाने के बाद बचे लाभ में से ही राजनीतिक दलों को चंदा दे सकते हैं. यह कोई भी समझ सकता है कि व्यापारी और उद्योगपति इस तरह का चंदा , कर चुकाने के बाद बची हुई अपनी कमाई में से नहीं देंगे. चंदा देने के लिए उनके पास काले धन का प्रबंध रहता है जिसे राजनीतिक दाल सहर्ष स्वीकार करते हैं. इस चंदे के एवज़ में शासक दल से अपेक्षा की जाती है कि कालेधन के खिलाफ कोई कड़ा रुख नहीं अपनाया जाएगा.  ऐसा होता भी है. इतना ही नहीं , इस पूंजीपति वर्ग को उनके फायडे के लिए सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की छूट भी दी जाती है.इस बार के बजट में कई  चीजों को  ओजीएल लिस्ट में शामिल किया जाना सार्वजनिक उद्योगों के लिए सुरक्षित क्षेत्रों में निजी उद्योगों को घुसने की इजाज़त देना इस बात का सबूत है. राजनीतिक दलों और कालाधन रखने वाले पूंजीपति वर्ग के बीच इस प्रकार के मधुर संबंधों के कारण ही अाज की राजनीति का जोर काले धन पर नहीं बल्कि काले धन का राजनीति पर कब्जा हो गया है.

अायकर , बिक्रीकर , उत्पादन कर , सीमा कर अादि से जुड अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार की वजह से कर के नियमों का कड़ाई से पालन नहीं हो पाता।  इसके फलस्वरूप करों  चोरी होती है. थोक , खुदरा एवं उत्पादन स्तर पर कालाधन के बनने की एक श्रृंखला शुरू हो जाती है.

कालाधन की वृद्धि में सरकार तथा बैंकों की गलत नीतियों ने भी अच्छा खासा योगदान किया है. बैंकों ने भारी पैमाने पार् सावधि -जमा खाते में रकमें जमा की हैं. जमा करने वाला यैह रकम कहां से लाता , बैंक इसकी जांच पड़ताल नहीं करता।  सात वर्षों में वह रकम दुगनी ही नहीं हो जाती बल्कि स्याह मुद्रा से सफेद मुद्रा  बदल जाती है. सरकार भी समय -समय पर सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्रों की कंपनियों को  करने की छूट देती है. ये कंपनियां , इस जमा धन पर 15 से 18 प्रतिशत तक सालाना ब्याज दे रहीं हैं. इन कंपनियों में भी काला धन ही जमा हो रहा है. जैब ये कंपनियां , जमाकर्ताओं को रकम लौटाएंगी तो वह कालाधन सफेद मुद्रा होकर रहेगी.

काले धन को सफेद धन में बदलने के कई तरीकों में से एक तरीका है - विभिन्न राज्यों और संस्थाओं द्वारा संचालित लाटरी के पुरस्कृत टिकटों को काला धन रखने वालों द्वारा विजेताओं से खरीदा जाना।  विजेता अगर खुद रकम प्राप्त करने जाता है तो  उसे  पुरस्कृत राशि में से ही विभिन्न प्रकार के कर चुकाने पड़ते हैं. पर काला धन रखने वाले इन विजेताओं को पुरस्कृत राशि से भी अधिक रकम देकर टिकट ले लेते हैं।  इस तरह  उनका काला धन सफेद जाता है.

इस देश में कितना पैसा काला है इसका  पता लगाना मुश्किल है. अर्थशास्त्रियों की मान्यता है कि काला धन , सामान्य पैसे की तुलना में दो से ढाई गुना गतिशील होता है. कालेधन की इस गतिशीलता के कारण ही उद्योग, व्यापार , जमीन -जायदाद की खरीद -फरोख्त , फ़िल्म निर्माण , नाज़ायज़ विदेशी मुद्रा की खरीद -बिक्री में और फर्जी नामों में से कितना काला धन कहां पड़ा हुअा है इसकी गिनती बहुत ही मुश्किल है.

इन कठिनाईयों के बाबजूद अर्थशास्त्रियों ने करेंसी नोटों के जीवनकाल और उनकी गतिशीलता , कर चोरी की दर तथा सर्वेक्षण जैसे कई अाधार अपनाकर समय- समय पर काले धन की मात्रा तय करने की कोशिश की है. प्रमुख अर्थशास्त्रियों में से केल्डोर ने 1953 -54 में  600 करोड़ रुपये , वांचू  ने 1961 - 62 में 700 करोड़ रुपये , 1963 -64 में 1000 करोड़ रुपये , 1968 -69 में 1400 करोड़ रुपये , रांगनेकर ने 1961 -62  में 1150 करोड़ रुपये , 1963 -64 में 2350 करोड़ रुपये , 1968 -69 में 2833 करोड़ रुपये , 1969 -70 में 3080 करोड़ रुपये , गुप्ता और गुप्ता ने 1968 -69 में 4504 करोड़ रुपये , 1969 -70 में 5458 करोड़ रुपये , 1977 -78  में 34335 करोड़ रुपये , 1978 -79 में 46866 करोड़ रुपये , ली अमिल ने 1978 -79 में 12163 करोड़ रुपये और एन. एस. प्रसाद ने 1978 -79 में 12611 करोड़ रुपये का कालाधन होने का अनुमान लगाया था।  एक फौरी अनुमान के तहत 1983 -84 में 508277 करोड़ रुपये का संचित काला धन था.

अाज़ादी के बाद से अब तक सरकार ने काले धन पर  रोक लगाने के कई तरीके अपनाए हैं. बिना अाय कर दिए एकत्र  किए गए पैसों पर छापा औऱ नए करदाताओं का पता लगाना एक तरीका है. दूसरा तरीका है कालेधन की स्वैक्छिक घोषणा करवाना.   अापातकाल के दौरान 1976 में सरकार ने घोषणा की , कि जो लाग स्वेक्षा से अपने काले धन की घोषणा कर देंगे उन्हें दंडित नहीं किया जाएगा. ऐसा करने वालों को कुछ छूट भी दी गई.  लेकिन इस उपाय से मात्र 1500 करोड़ रुपये के कालेधन की ही घोषणा हो पाई.

जनता सरकार ने 1977 में कालेधन को समाप्त करने के लिए एक हज़ार रुपये के करेंसी नोटों का प्रचलन बंद कर दिया. लेकिन इस उपाय का भी असर ज्यादा नहीं हुअा और सिर्फ 790 करोड़ रुपये का ही काला धन बाहर अा सका.

1980 में इंदिरा गांधी की सरकार ने ' विशेष धारक बांड ' चलाई।  इस बांड को खरीदने वालों के खिलाफ न सिर्फ कानूनी कार्रवाई न करने का अाश्वासन दिया गया बल्कि 10 साल बाद दो फीसदी के हिसाब से सूद समेत  सफेद पैसा लौटाने का भी वादा किया गया. इस उदार कदम के बावजूद सिर्फ 963 करोड़ रुपया ही बाहर अा सका जो कालेधन के महासागर का चुल्लू भर ही था.

दरसल शासक वर्ग औऱ उसके अपने अर्थशास्त्रियों ने काले धन को मिटाने या हटाने की अाज तक जो भी योजना पेश की है उससे कालेधन के पैदा होन में कोई रोक नहीं लगी है बल्कि स्याह को सफेद करने में मदद ही मिली है.स्याह से सफेद बने  इस धन की ताकत  औऱ भी ज्यादा होती है.

कालेधन ने समाज में एक ऐसे संस्कृतिविहीन नवधनिक वर्ग को भी जन्म दिया है जो नैतिक मूल्यों की छीछालेदारी करने की प्रक्रिया में एक प्रमुख घटक है. इस वर्ग ने काले पैसे के बल पर राजनीति में घुसपैठ की और समाज के अार्थिक , राजनीतिक -सामाजिक जीवन को प्रदुषित कर दिया.

काला धन पर  नियंत्रण लगाना वर्तमान परिस्थतियों में भी संभव है. लेकिन यह देखा गया है जब कभी सरकार ने कालेधन रखने वालों के खिलाफ कठोर कदम उठाने का फैसला किया तो कालेधन के दबाव में सरकार पीछे हट गई।  सरकार ने कभी भी इस समस्या को ईमानदारी से हल नहीं करना चाहा.  सरकार ऐसा कर भी नहीं सकती।  क्योंकि कालेधन का चुनाव में प्रयोग होता है औऱ उसका सबसे अधिक फयदा  सत्तारूढ़ दाल ही उठाता है.

प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हाल के विधान सभा चुनावों से पहले काला धन को समाप्त करने का जो वादा किया था वह उनकी सरकार के इस साल की अार्थिक जरूरत , बजट ,  के बाद औऱ कुछ नहीं चुनावी स्टंट ही साबित हुअा. अब शायद जनता से यह अाशा की जा रही है कि वह प्रधानमंत्री का कहा सुना भूल जाए.


" जय भीम -लाल सलाम " सलामी समावेसी नहीं




" जय भीम -लाल सलाम " की सलामी समावेसी सल्यूट नहीं है. इसके अन्तर्निहित द्वंद्व और विरोधाभास भी हैं , कार्यनीतिक और रणनीतिक रूप से भी .यह सलामी , हरे रंग को दरकिनार करता है जो मुस्लिम ही नहीं किसानी रंग भी है. इसे सही है यह

हिन्दुस्तान में " नए वाम " का विकास , वर्गीय चेतना और प्रतिरोध बढ़ा कर ही हो सकता है कुंद कर नहीं. लाल रंग क्रांतिकारी चेतना का वैश्विक प्रतीक है. तय है कि लाल रंग ही  नए वाम की धूरी होगी। लेकिन यह भी स्पष्ट रहे कि प्रतिरोध का पहिया सिर्फ धूरी के बल फिलवक्त नहीं बढ़ाया जा सकता है. लाल रंग के सर्वकालिक वर्चस्व की अनिवार्यता की जिद ना रहे तो बेहतर।

मौजूदा दौर में प्रतिरोध की बिखरी ताकतों के बीच न्यूनतम सहमति के कार्यक्रमों को लेकर बढ़ने की जरुरत है. लेकिन उसके लिए लामबंदी के वास्ती समावेसी सलामी अपनाने की भी जरूरत है. कोई जरुरी नहीं कि व्यापक लामबंदी में शामिल हो सकने वाली ताकतें अपनी पहचान और अपने रंग का परित्याग कर ही साथ आएं। उत्पीडित समूहों की अलग पहचान बनाये रखना , नए वाम को विविधता -युक्त -एकता प्रदान करेगा।

जेएनयू वालों के बीच मेरा प्रस्ताव इंद्रधनुषी सलाम नही बल्कि " रेनबो सल्यूट " है जिसे मुम्बई की एक सभा में कामरेड शेहला ने अपना कर " सतरंगी सलाम " कहा जो विग्यान और सहज भाषाई द्रष्टि से भी " सबरंगी सलाम " के सुझाव से ज्यादा बेहतर है . रेनबो में सभी प्राथमिक रंग शामिल हैं. लाल , नीला , हरा आदि प्राथमिक रंग है। भगवा , प्राथमिक रंग नहीं है.

इंद्रधनुष शब्द , ' रेनबो ' का विग्यान-सम्मत वैकल्पिक शब्द नही है. यह मूल रूप से अंधविश्वास और ब्राह्मणवादी सोच पोषित करता है. पौराणिक आख्यान में इंद्र , देवताओं के राजा कहे गए है. उन्ही पौराणिक आख्यान के अनुसार इंद्र ने अहिल्या से बलात्कार किया था.

हमें नए वाम की सोच बढ़ाने के लिए नए प्रयोग करने ही होंगे। इन प्रयोगों से नए रास्ते खुलेंगे , कारवां बढ़ाने की ज़मीन तैयार होगी।

Friday, July 8, 2016

चुनाव के किस्से- बासी कढ़ी में उबाल

चुनाव के किस्से
लोकसभा चुनाव 1999 : बासी कढ़ी में उबाल

बारहवीं लोकसभा में 21 मार्च 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार सिर्फ एक वोट के अंतर से विश्वास -मत प्रस्ताव हार गई. इसके कुछ ही दिनों बाद राष्ट्रपति ने यह देख कर कि कोई वैकल्पिक सरकार नहीं बन सकती है निर्वाचन अायोग को 13 वीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव कराने के अादेश दे दिए.  चुनाव की तैयारियां तभी से शुरू हो गई थी.

प्रारंभ में ऐसा लगा कि चुनाव जल्दी हो जाएंगे. सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की भी मांग थी कि चुनाव मई -जून तक संपन्न करा लिए जाएं। समाचार माध्यमों और विशेषकर संवाद समितियों ने चुनावी खबरों के लिए अपनी कमर कसनी शुरू कर दी. अनेक भाषाई समाचारपत्रों में तो विभिन्न लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के भूगोल और चुनावी इतिहास की खबरें छपनी भी लगी। संवाददाताओं के बीच यह अाम धारणा थी कि ज्यादा मेहनत नहीं करनी होगी. क्योंकि 1998 में हुए पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान संकलित समाचार , सर्वेक्षण और अांकड़े बहुत उपयोगी होंगे। बस उनमें थोड़ी और बातें , खबरें जोड़ कर काम चल जाएगा।

मै तब लखनऊ में पदस्थापित था और निजी कारणों से कुछ दिनों के लिए हैदराबाद गया था. मेरी न्यूज़ एजेसी के वहां के कार्यालय में एक दिन एक प्रमुख भाषाई समाचारपत्र के प्रतिनिधि कम्प्यूटर में सुरक्षित पिछले चुनावी समाचार और अांकड़ों को मांगने पहुंचे. संयोग से उन्हें वह सब कुछ कम्प्यूटर फ्लापियों में मिल गया जो वह मांगने अाये थे. लगा कि सूचना प्रोधोगिकी ने हमारा काम कितना अासान बना दिया है.

मेरे लखनऊ लौटते -लौटते निर्वाचन अायोग ने घोषणा कर दी थी कि चुनाव सितंबर- अक्तूबर में होंगे. सबने सोचा काफी वक़्त मिल गया है. चुनावी खबरों की और  तैयारी में मदद मिलेगी। हमने उत्तर प्रदेश के सभी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के बारे में अंकड़ें और अन्य सूचनाएं एकत्रित कर उन्हें भावी उपयोग के लिए कम्प्यूटर में भरना शुरू कर दिया।

 मै मूलतः हिंदी में कार्य करता रहा हूँ।  लेकिन इस बार के चुनाव ने मुझे ' द्विभाषी ' पत्रकार बना दिया।  कारण , कम्प्यूटर पर हिंदी के बजाय अंग्रेजी में काम करना अासान लगा। तब यूनीकोड नहीं था। टाइपिंग से लेकर सॉफ्टवेयर तक सभी चीजें अंग्रेजी के ज्यादा अनुकूल थी. इंटरनेट पर निर्वाचन अायोग के वेबसाइट से लेकर इंडिया टुडे के चुनावी वेबसाइट ' इंडिया डिसाइड्स ' तक पर उपलब्ध जानकारी अंग्रेजी में ही थी. इन सबको डाउनलोड कर मै पहले कटिंग -पेस्टिंग कर और उनमें अपनी खबर जोड़ कर समाचार तैयार कर लेता था और फिर खुद ही उनका हिंदी रूपांतरण भी कर लेता था।

इस बीच विश्व कप क्रिकेट और फिर कारगिल प्रकरण के कारण चुनाव की खबरें समाचारपत्रों  में दब गयीं।  हमारी सारी तैयारियां धरीं रह गईं।  लेकिन चुनाव कार्यक्रमों की निर्वाचन अायोग द्वारा घोषणा किए जाने के साथ ही चुनाव की खबरों की रेल फिर पटरी पर अा गई।  कम्प्यूटर में कुछ माह पहले भरे हमारे चुनावी समाचार काम अाने लगे।

एक रोचक किस्सा यूं रहा।  1996 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ सीट से प्रत्याशी एवं भाजपा नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में मैने एक प्रोफाइल तैयार किया था. वह 1998 में भी काम अाया था. 1999 के लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब वह पहली बार लखनऊ अाये तो उसी पुराने प्रोफाइल में तनिक परिवर्तन कर और ऊर्दू की एक नज़्म का एक अंश जोड़ कर मेरा काम चल गया। अलबत्ता इस बार मैन उस प्रोफाइल का अंग्रेजी तर्जुमा भी कर दिया।

 बहरहाल , वो अंश जिसे इस्तेमाल कर भाजपा वालों ने पोस्टर भी निकाले ये था , " अास्मा में क्या ताब है / कि छुड़ाए लखनऊ हमसे / लखनऊ हम पर फिदा / हम फिदा-ऐ -लखनऊ '.
प्रोफाइल के अंग्रेजी स्वरूप में ये अंश रोमन में लिख उसका भावानुवाद कर दिया था. प्रोफाइल के दिल्ली में अनुदित ऊर्दू स्वरूप में इस अंश को शुद्ध रूप से लिख चार चांद लगा दिए गए.

अगली सुबह संपादक जी ने दिल्ली से मुझे फोन कर कहा , " वाह क्या बात है.पीएम की तुम्हारी बनाई प्रोफाइल देश भर के लगभग सभी अखबारों में झमाझम छपी है.वेल डन. वी अार प्राउड अॉफ यू ". उन्हें क्या पता था कि मै बासी कढ़ी में उबाल ले अाया था  !

Friday, April 29, 2016

India's progression from quasi -facism to fascism






Adolf Hitler (20 April 1889– 30 April 1945) must be feeling happy , posthumously , to see " India i.e. Bharat " progressing from quasi -fascism into the 1st round of full fascism with attack in Delhi on Professor G.N. Saibaba ( 80 % physically disabled ) by the goons of the RSS (fascist since its inception ) , punishments ordered by the JNU Vice Chancellor M. Jagadesh Kumar (poorly concealed in the RSS dress and ever willing to execute the RSS script in the Campus) to more than a dozen JNU students ( including emerging heroes of India like Kanhaiya Kumar , Umar Khalid , Anirban Bhattacharya , all released on bail by court/s amid police admittance of no proof against them for their alleged "crimes " ) , release of all Malegaon- terror blast accused ( including Sadhvi Pragya & Lt Colonel Purohit , booked & arrested by Anti-Terrorist-Squad(Mumbai) Chief Hemant Karkare , slain in the Mumbai 26/ 11/ 2008 terror ataack , official announcement of nomination of India's best known agent provocateur , Subramanian Swamy as member of the House of Elders of India's Parliament , and not the least , Chief Justice of India Justice Tirath Singh Thakur crying before Prime Minister of India Narendra Modi to act for justice to prevail.
‪#‎SuchintanKuchintan‬

Wednesday, April 27, 2016

आ चल के तुझे......



 
आ चल के तुझे, मैं ले के चलूं
इक ऐसे गगन के तले
जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो
बस प्यार ही प्यार पले
इक ऐसे गगन के तले

सूरज की पहली किरण से, आशा का सवेरा जागे  
चंदा की किरण से धुल कर, घनघोर अंधेरा भागे   
कभी धूप खिले कभी छाँव मिले
लम्बी सी डगर न खले
जहाँ ग़म भी नो हो,  आँसू भी न हो ...

जहाँ दूर नज़र दौड़ आए, आज़ाद गगन लहराए
जहाँ रंग बिरंगे पंछी, आशा का संदेसा लाएं   
सपनो मे पली हँसती हो कली
जहाँ शाम सुहानी ढले
जहाँ ग़म भी न हो,  आँसू भी न हो ...
आ चल के तुझे मैं ले के चलूं ...
गीत:शैलेन्द्र ,गायन और सॅगीत:किशोर कुमार, फिल्म: दूर गगन 
की छांव में(1964)
 
https://youtu.be/-YAs2cQAiE8

Sunday, April 17, 2016

Cry Till All Are Awake Resolutely

Don't cry
If I die , naturally

Don't cry
If, I die , accidentally

Don't cry
If , I'am killed logically

Don't cry
If , I perish , mysteriously


Don't cry
If , I live as dead , silently

Do Cry
When we in me , you and all others die , unnaturally

Do cry
When we in me , you and all others die , accidentally


Do cry
When We in me , you and all others are killed , illogically

Do cry
Whwn we in me , you and all others perish , obviously


Do cry

When  our nation is  dieying  unnaturally

Do cry
When  our nation is being condemned to die , accidentally

Do cry
When our nation lives as dead , silently

Cry , cry , cry
Till all are  awake , resolutely


Wake up , wake up , wake up
If we in me , you and all others are sleeping

Wake up , wake up , wake up
If we in me , you and all others are alive ,  convincingly

Wake up , wake up , wake up
To let Unborn in me , you and all others to born
To resist injustice
To fight for justice
To live & die as human beings
To save our nation in me , you and all others , decidedly

Thursday, April 14, 2016

बाअदब : 11



 गरेंबा - 01
ईक दिल- फरेब ने फरमाया
खुद के गरेंबा में झांको पहले
झाँका तो देखा बार -बार
गर्दन पर सवार वही दिल -फरेबां

सोशल मीडिया का नया दौर- 1





अंधभक्तों की अंधभक्ति कमजोर पड़ती नज़र आती है.  भक्तों का झुण्ड हम गैर -भक्तों को दबोचने लगभग नहीं टपकता.  वे बेचारे करे भी तो क्या करें.  तमाम गैर -भक्तों ने सोशल मीडिया पर लामबंदी कर ली है. उनके एक- से -बढ़कर -एक पोस्ट , भारी पड रहे हैं कूड़ा -कचरा फैलाने वाले भक्तों पर.

पहले शाम के वक़्त ही गैर -भक्त , सोशल मीडिया पर टहलने आते थे. कुछ डिनर से पहले या बाद में हलकी सैर करने के अंदाज में प्रगट होते थे और कुछ ही देर में भक्तों की भारी भीड़ से तंग आकर चले जाते थे. अब उनकी अर्ली मॉर्निंग वाक से लेकर जॉगिंग तक शुरू हो चुकी है.बहुतेरे साथी सुबह से देर रात तक सोशल मीडिया पर नज़र रखे होते है ताकि किसी भी और गैर -भक्त साथी को भक्तों का झुण्ड ना घेरे.

छात्र , युवक , लेखक , पत्रकार , कवि , नाट्यकार , फिल्मकार और प्राध्यापक ही नहीं डॉक्टर , इंजीनियर आदि प्रोफेशनल भी बड़ी संख्या में सोशल मीडिया के वैचारिक रण क्षेत्र में उतर आये है लोकतंत्र की हिफाज़त के लिए. सबसे गौर तलब बात यह है गैर -भक्तों की लगातार बढ़ती पंक्ति में महिलाओं की बड़ी भागीदारी है. लद गए वो दिन जब भक्तों का झुण्ड , सोशल मीडिया पर किसी भी गैर- भक्त महिला साथी को बिन किसी प्रतिरोध के घेर लेते थे. ट्विटर अभी भी क्लासेज के लिए है और फेसबुक मासेज के लिए.

भाड़े के टट्टू कहिये कि मर्सीनरीज , इन भक्तों के हौसले पस्त हो गए लगते हैं. शायद उनकी पगार भी बंद या कम कर दी गई है. कन्हैया ने यूं ही नहीं कहा कि उनकी पगार बढ़वाने के आंदोलन में भी वह शामिल होगा.

हाँ ,  आरएसएस के खांटी स्वयंसेवक अभी भी मंडराते है पर उनके पास अपना लगभग कुछ भी नहीं पढ़ने- लिखने , पढ़ाने और सुनाने के लिए. वो ज़ीटीवी का मुंह जोहते रहते है या फिर देश में बढ़ रहे जन आंदोलन को कुंद करने की फिराक में उन विषयों को उठाने की फिराक में रहते है जो आम जन के तात्कालिक मुद्दे नहीं है. वो आपस में ही एक दुसरे की पीठ थपथपा खुश -खुश हो लेते हैं.

मुंबई में मध्य  रेलवे का एक उपनगरीय स्टेशन है , कांजुर मार्ग।  इसे काल सेंटर कैपिटल ऑफ़ इंडिया भी कहते हैं। वहां से लेकर आयीआयीटी मुंबई और भांडुप तक के इलाके में ढेरों कॉल सेंटर है।  इनमें काम करने वाले करीब पांच लाख युवाओं में से अनेक ने कहा , " अंकल , अब उतना मज़ा नहीं आता है भक्ति में ".

दूसरे  ने कहा " पहले तो हमें सिरिफ लाईक करने के लिए भी बहुत मिल जाता था , कट -पेस्ट करने का अलग से।  अब वो बात नहीं रही" .

एक मराठी युवती ने कहा , " कन्हैया के सामने आने के बाद से भक्ति का काम धंधा बहुत खराब चल रहा है. हम सबको अच्छा लगता है जब हमारे बीच का कोई भी माणूस लोकल ट्रेन में मोबाईल , टैबलेट , लैपटॉप पर कन्हैया की स्पीच सुनते -सुनाते गुनगुनाने लगता है - ' कन्हैया , आला रे , आला ".

 दो अल्पवय  " पूर्व भक्त " मुझे उसी कांजुर मार्ग रेलवे स्टेशन पर कुछ सुबकते -रोते से नज़र आये।  जब पूछा क्या हुआ तो एक ने कहा , '" नौकरी चली गयी ". पूछा , " क्या नौकरी थी?"  दूसरे ने कहा , " फेसबुक की नौकरी थी ". मैंने कहा , "  तब तो बहुत अच्छी नौकरी थी , पगार भी अच्छी रही होगी.  उसके एक्सपेरिएंस पर और कंही नौकरी तो मिल ही जायेगी , ट्राई करो. रोते क्यों हो ? "

दोनों मुझे टुकुर- टुकुर देखने लगे. मैंने पूछा , " चाय पीओगे ? " .दोनों हाँ बोल मेरे संग स्टेशन से बाहर कटिंग चाय वाले तक आये। पोहा भी खाया और फिर चाय पी. खाते -पीते बहुत कुछ बताया दोनों ने। 

उन्होंने जो कुछ बताया मैं अचंभित रैह गया. नौकरी फेसबुक की नहीं , फेसबुक पर थी , बारह घंटे.   हर हफ्ते का पगार था एक हज़ार रूपये. काम वही , भक्तों के पोस्ट अलग अलग फेक  आईडेंटिटी से " लाइक " करना , उनको ईमेल से मिले ' कच्चे माल ' को यहां वहाँ चिपकाना , गैर भक्तों  के पोस्ट पर जितनी गालियां सिखायीं गयी वो दाग देना.

नौकरी से इसलिए निकाल दिए गए कि वे ड्यूटी पर कन्हैया का स्पीच का आनंद लेते पकडे गए.